आप भी इक बार जाकर जेल से हो आइये

ग़ज़ल

क़ौम-ओ-मिल्लत क़ौम-ओ-मिल्लत कह के मत भरमाइये,
क़ौम के बच्चों को पहले जेल से छुड़वाइये।

सुन्नते-ऐ-यूसुफ़ हमारी क़ौम पर आयद तो है,
आप भी इक बार जाकर जेल से हो आइये।

ख़ालिद-ओ-शरजील की ख़ातिर किया क्या आपने,
उनकी ख़ातिर कोर्ट तक पहुचें कभी बतलाइये।

आप की तक़रीर की हम क़द्र करते हैं मगर,
फ़ायदा उसका हुआ किसको ज़रा समझाइये।

आप के सूबे से कितने आते हैं संसद तलक,
उसमें कितने आप के हैं वो भी तो गिनवाइये।

मुल्क में तादाद कितनी है हमारी देखिए,
और फिर कैसे हुकूमत अपनी हो समझाइये।

कोसने से कुछ नहीं होगा नदीमुल्लाह को,
आप की हमसे तवक़्क़ो क्या है ये बतलाइए।

नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥