जितना भी चाहे सता ले तू सताने वाले,
तुझ को बख्शेंगे नहीं मेरे घराने वाले।
ईद के दिन भी कहाँ कपड़े नये मिलते थे,
हम तो उस दिन भी पहनते थे पुराने वाले।
मुंह छिपाये हुए फिरते हैं आज मुझ से वो,
क़हक़हों में मेरी बातों को उड़ाने वाले।
अब कहाँ जा के सुनाये कोई ग़ज़लें अपनी,
अब कहाँ रह गये महफ़िल को सजाने वाले।
अब तो ये रस्म भी महदूद है अफ़सानों तक,
अब कहाँ आते हैं रूठों को मनाने वाले।
ईद और होली कहाँ घर पे मनाते हैं ये,
अब तो परदेश में रहते हैं कमाने वाले।
टूट जाये न कहीं सब्र की अब हद ये नदीम,
होश में कह दो रहें हमको डराने वाले।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥