रास्ते की मुश्किलों को हमसफ़र हमने किया

स्याह शब को चिलचिलाती दोपहर हमने किया
रास्ते की मुश्किलों को हमसफ़र हमने किया

खुद ही अपनी ख्वाहिशों को दर ब दर हमने किया
हमको ये अफ़सोस इक अंधा सफ़र हमने किया

तू नहीं आया तो कुछ ऐसे बसर हमने किया
रो के अपनी आस्तीं को तर ब तर हमने किया

सौ चराग़ों के उजाले आज शरमा जाएंगे
दिल में छायी तीरगी को कम अगर हमने किया

अपनी सरहद पर दुआओं के सिपाही भेजकर
दुश्मनों की साज़िशों को बेअसर हमने किया

राह में चलने से पहले हाथ मे लेकर चिराग़
आंधियों को भी ‘किरण” है बाख़बर हमने किया

©डॉ कविता”किरण”