कितना अनोखा लगता है

शीर्षक-परिवर्तन

विधा-पद्य

कितना अनोखा लगता है,

जीवन का ये परिवर्तन प्यारा।

भूमिकाएँ बदलती जा रही,

पर बंधन लगता न्यारा।।

 

उँगली थामकर जो कभी, हमारे चलते थे।

अब वही हमारे डगमगाते कदमों के, सहारा बनते हैं।

 

बचपन में डगमगाते कदमों से,

जब वो गिरते थे।

दौड़ कर उठाती मैं फिर सीने से लगाती थी।

जिनके पीठ पर कभी किया करते थे घुड़सवारी।

आज उनके लड़खड़ाते कदमों को,

देख कहते हैं- पापा जरा संभल के।।

 

कभी जिनको अपने हाथों से , छोटे-छोटे कौर खिलाते थे।

आज हमारे काँपते हाथों को देख कहते-माँ ! जरा संभल के।।

 

कभी जिन्हें मैं राह दिखाती , सपनों की उड़ान भरना सिखाती।

वही आज मेरी दिशा तय करते हैं,

कहते माँ -पापा !हम हैं ना साथ तुम्हारे।।

 

परछायीं सी मेरी बिटिया,

कभी मेरी सफ़ेद उलझे लटों

को भी सुलझाती है।

बेटा भी कभी पापा के , थके पैरों को सहलाता है।।

 

कभी जिनके आँसू ,मेरी दुनिया हिला देते थे।

वही आज हमारे चश्मे, ढूँढ कर देते हैं।।

 

समय बढ़ता गया, ज़िम्मेदारी भी बढ़ती गई।

रिश्ते अभी भी वही हैं पर , उनके मायने बदल गए हैं।।

 

संस्कारों के नन्हें बीज, अब बरगद बन कर देने लगे सहारा।

कहने को तो सब कुछ बदल गया,

पर आज भी हमारे रिश्तों का बंधन है प्यारा।

 

कितना सुंदर है ये परिवर्तन, जो कल छोटे से थे, आज हुए बड़े।

जिन्हें कल हर वक़्त सहारे की थी जरूरत,वही आज हमारे बुढ़ापे का सहारा बने।।

सचमुच कितना सुखद है ये बदलाव—-

अंजलि किशोर”कृति”

उखरा, पश्चिम बंगाल