राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने रखा पूज्य रामभद्राचार्य जी के वक्तव्य का वास्तविक आशय, कहा — “शब्दों पर नहीं, अर्थ पर ध्यान दें”

अयोध्या — राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने रखा पूज्य रामभद्राचार्य जी के वक्तव्य का वास्तविक आशय, कहा — “शब्दों पर नहीं, अर्थ पर ध्यान दें”

अयोध्या।
जगद्गुरु परमहंस आचार्य तपस्वी छावनी के पीठाधीश्वर के प्रथम शिष्य उत्तराधिकारी प्रख्यात संत श्री राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने आज समाज के सामने जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज के हाल के वक्तव्य का वास्तविक भाव स्पष्ट करते हुए कहा कि “गुरु के वचनों को केवल शब्दों में नहीं, चेतना के स्तर पर समझने की आवश्यकता है।”

महंत एकनाथ महाराज ने कहा कि आज के समय में लोग किसी भी कथन को सुनते ही प्रतिक्रिया दे देते हैं, जबकि सच्चे गुरु का उद्देश्य कभी भी किसी समाज, वर्ग या व्यक्ति को आहत करना नहीं होता। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को ‘पत्नी’ नहीं, ‘अर्धांगिनी’, ‘शक्ति’ और ‘देवी’ की उपाधि दी गई है। यह परंपरा केवल शब्दों का प्रयोग नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की आत्मा है।

उन्होंने कहा कि वेदों का संदेश स्पष्ट है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” — जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवत्व का वास होता है। इसके विपरीत पश्चिमी जीवन-व्यवस्था में विवाह को स्थायी बंधन नहीं माना जाता और संबंध अक्सर सुविधाओं पर आधारित होते हैं। जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी ने इसी भिन्नता को सरल भाषा में उदाहरण देकर समझाया था।

महंत ने समाज को आगाह करते हुए कहा कि यदि भारत अपनी जड़ों से कटता गया, तो अगली पीढ़ियाँ पहचान और संस्कृति खो बैठेंगी। उन्होंने कहा कि “भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, चेतना का वाहक है। जब ‘मां’ की जगह ‘मम्मी’ और ‘पिता’ की जगह ‘डैड’ लेने लगते हैं, तब यह सिर्फ़ भाषा परिवर्तन नहीं—सभ्यता के बदलने का संकेत है।”

उन्होंने शास्त्र का सूत्र “धर्मो रक्षति रक्षितः” उद्धृत करते हुए कहा कि अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं को बचाना हर भारतीय की जिम्मेदारी है।
महंत एकनाथ महाराज ने कहा—
“भारत को भारतीय रहना चाहिए। हम अनुकरण करने वाली नहीं, दिशा दिखाने वाली सभ्यता हैं। सनातन केवल धर्म नहीं, जीवन है—जिसे केवल पढ़ना नहीं, जीना होता है।”

अंत में उन्होंने समाज से अपील की कि लोग किसी भी गुरु या संत के कथन को शब्दों में नहीं, उसके वास्तविक अर्थ में समझें।
“गुरु का वचन दर्पण नहीं, दिशा होता है। यदि हमारी पीढ़ियाँ अपनी भाषा और संस्कृति को गर्व से अपनाएंगी, तभी भारतीयता जीवित रहेगी।”