कुदरहा, बस्ती। समीक्षा खुद की, परीक्षा अपनों की एवं प्रतीक्षा ईश्वर के कृपा की करनी चाहिए। लेकिन यह बिना सत्संग के संभव नहीं है। जहाँ रामकथा जीवन जीने की कला सिखाती है वहीं श्रीमद्भागवत कथा हमें मोक्ष प्रदान करती है। उक्त बातें काशी से पधारे कथावाचक सत्यम सांकृत जी महाराज ने छरदही मे चल रही नौ दिवसीय संगीतमयी श्री मद्भागवत कथा के सातवें दिन ब्यास पीठ से प्रवचन सत्र में ब्यक्त किया। उन्होंने कहा कि श्री कृष्ण लीलामृत में महारास में जीवात्मा का परमात्मा से मिलन हुआ, जीवात्मा और परमात्मा के मिलन को ही महाराज कहा गया है। जब जीव में अभिमान आ जाता है तब भगवा दूर हो जाते है लेकिन जब कोई भगवान के अनुराग में विरह में होता है तो उससे मिलकर दर्शन देते हैं। रुक्मणी विवाह की कथा को विस्तार देते हुए कि रुक्मणी के भाई ने उनका विवाह शिशुपाल के साथ सुनिश्चित किया था, लेकिन रुक्मणी ने संकल्प लिया था कि वह शिशुपाल को नहीं केवल गोपाल को पति के रूप में वरण करेंगीं। शिशुपाल असत्य मार्गी है। द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण सत्य मार्गी है। इसलिए वो असत्य को नहीं सत्य को अपनाएगी। अंत मे भगवान श्रीद्वारकाधीशजी ने रुक्मणी के सत्य संकल्प को पूर्ण किया। श्री कृष्ण रुक्मणी विवाह की झांकी ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। इस दौरान यजमान हरेंद्र प्रसाद दुबे, निर्मला देवी, आनंद दुबे, वेदमणि, प्रिया, मृणाल मंजरी, अनीता, श्री कृष्ण दुबे, हरिद्वार दुबे, राजबहादुर दुबे, रजनीश गोस्वामी, रवि गिरी, गुड्डू दुबे, सचिन दुबे, अमित विक्रम, शार्दुल सम्राट, दिशांत चिन्मय, रामवृक्ष मिश्रा, सतीश तिवारी, सहित सैकड़ो लोग मौजूद रहे।
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