किस से पूछूँ के मरहला क्या है,

एक नयी ग़ज़ल आपकी समाअतों के हवाले………………

किस से पूछूँ के मरहला क्या है,
सब हैं ख़ामोश मसअला क्या है।

हर घड़ी रब से माँगता क्या है,
पहले ये जान करबला क्या है।

जिस को देखे से होश उड़ जाये,
मैं भी देखूँ तो वो बला क्या है।

जल क्या घर तो रो रहे हो क्यों,
तुम हो महफ़ूज़, फिर जला क्या है।

अब भी इस की ख़बर नहीं तुझ को,
आसतीं में तेरे पला क्या है।

जा के अफ़ग़ानियों से पूछो तुम,
वो बताएँगे ज़लज़ला क्या है,

तुझ को उस्ताद से ग़ज़ल न मिले,
फिर बता दे तेरा गला क्या है।

और कितना गिराऊँ ख़ुद को नदीम,
अब तो पूछो मुतालबा क्या है।

नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥