
अनुराग लक्ष्य, 11 जुलाई
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
कोई भी इंसान जब अपनी शायरी के सफ़र में इश्क़ ए मेज़ाजी से इश्क़ ए हक़ीक़ी की तरफ बढ़ता है तो वो बन्दा अपने रब के बहुत क़रीब हो जाता है। और सही मायनों में अगर देखा जाए तो वो शायर और अदीब अपनी शायरी के ज़रिए पूरी मखलूक से प्यार करने लगता है।
आज की तारीख़ में सलीम बस्तवी अज़ीज़ी की लशायरी भी उसी रास्ते पर गामज़न है जहाँ हिन्दू मुस्लिम, मंदिर मस्जिद, का फर्क मिट जाता है।
आज सलीम बस्तवी अज़ीज़ी इश्क़ ए मेज़ाजी से निकल कर इश्क़ ए हक़ीक़ी से लबरेज कुछ अशआर के साथ रूबरू हो रहे हैं, इस उम्मीद के साथ कि जैसे आपने इससे पहले जो प्यार दिया है। आज भी उसी प्यार से नवाज़ेंगे ।
सबकी दुनिया संवार दे मौला
दिल में खुशियाँ हज़ार दे मौला
ग़म के साए न आएँ राहों में
अपनी रहमत से तार दे मौला ।
सुबह तुझसे है शाम तुझसे है
है जो मेरा यह नाम तुझसे है
जिसको पढ़कर दीवानी है दुनिया
मेरा सारा कलाम तुझसे है ।
मशकूर हूँ ममनून हूँ या रब्ब ए कायनात
कतरे को आज तूने समन्दर बना दिया
आग़ाज़ भी अंजाम भी उस शख्स के ही नाम
मालिक ने जिसे इल्म का गौहर बना दिया ।
या रब्ब दर ए हबीब का सदका मुझे भी दे
खुल्द ए बरीं को जाए जो रस्ता मुझे भी दे
मौला मेरे कुछ तो अता कर दे , सलीम, को
क़ुरआन दे, नमाज़ दे, रोज़ा मुझे भी दे ।