औरत की औरत से दोस्ती: बदलाव की शुरुआत

हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जो निरंतर प्रगति की ओर बढ़ रहा है — तकनीक, शिक्षा, व्यवसाय, हर क्षेत्र में। लेकिन एक सच्ची प्रगति तब होगी जब स्त्रियाँ एक-दूसरी की शक्ति बनेंगी, न कि प्रतिस्पर्धा।

 

मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों से जाना है कि एक औरत के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा भी एक औरत हो सकती है, और सबसे गहरी चोट भी। जब कोई महिला किसी दूसरी महिला को समझती है, उसका समर्थन करती है, उसे प्रेरित करती है, तो वो दोनों सिर्फ एक-दूसरे को नहीं, बल्कि पूरे समाज को एक बेहतर दिशा देती हैं।

 

लेकिन दुर्भाग्यवश, कई बार मैंने यह महसूस किया है कि पुरुषों से अधिक, स्त्रियाँ ही स्त्रियों की राह में रोड़े अटकाती हैं — जलन, तुलना और असुरक्षा के चलते। यह कटु सत्य है कि कई बार एक महिला दूसरी महिला को बढ़ता देख नहीं पाती, बजाय उसके लिए फूल बिछाने के, वह कांटे बिछा देती है। यही सोच हमें रोकती है, और यही सोच हमें बदलनी होगी।

समाज को महिलाओं की एकजुटता की ज़रूरत है — ऐसी एकजुटता जो ईर्ष्या नहीं, सहयोग से भरी हो। हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम अपने आस-पास की महिलाओं को प्रेरित करें, उन्हें समझें, और उनका सहारा बनें। एक मां अपनी बेटी के लिए, एक बहन अपनी बहन के लिए, एक सहकर्मी अपनी साथी के लिए जब सहारा बनती है, तभी सच्चा नारी-सशक्तिकरण होता है।

 

आइए, हम यह प्रण लें कि हम एक-दूसरे की शक्ति बनेंगे। हम फूल बनेंगे, कांटे नहीं।

 

व्यक्तिगत अनुभव

नेहा वार्ष्णेय

दुर्ग छत्तीसगढ़