ग़ज़ल
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गिरगिट की तरह रंग बदलने लगे हैं लोग।
नफ़रत की आग में खुद जलने लगे हैं लोग।।
आवेश की आँधी में संस्कार भुलाके।
पत्थर की तरह आज उछलने लगे हैं लोग।।
मतलब से रात दिन आते थे पास में।
अब रास्ता बदलके चलने लगे हैं लोग।।
स्वार्थ में अँधे हुए हैं आज इस कदर।
झूठ के सांँचे में अब ढलने लगे हैं लोग।।
कुछ कारनामे कर दिये हैं जान बूझ कर।
अपने किये पर हाथ अब मल ने लगे हैं लोग।।
ये सखी किसको कहें अच्छा ज़हान में ।
इंसानियत को आज सब छलने लगे हैं लोग।।
अंजना सिन्हा “सखी ”
रायगढ़