🌾 *ओ३म्*🌾
📚 ईश्वरीय वाणी वेद 📚
*ओ३म् हिरण्यगर्भ : समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवी द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।*
। ऋग्वेद १०-१२१-१।।
🥝 *मंत्र का पदार्थ*🥝
🌼 अग्ने = पहले अर्थात् सृष्टि की रचना से पूर्व। 🌼 हिरण्यगर्भ: = प्रकाशयुक्त पदार्थों के बीज रुप को अपने गर्भ में रखने वाला या धारण करने वाला 🌼 सम् अवतर्त = था । वह 🌼 भूतस्य = उत्पन्न हुईं सृष्टि का 🌼 एक: = अकेला, अद्वितीय 🌼 जात: = स्वयंसिद्ध, स्पष्ट 🌼 पति: = स्वामी 🌼 आसीत् = था । उसी परमात्मा ने 🌼 पृथिवीम् = इस पृथ्वी को 🌼 उत = और 🌼 इमाम् द्याम = इस द्युलोक को 🌼 दाधार = धारण किया हुआ है। 🌼 कस्मै – एकस्मै = उसी एक परमात्मा को 🌼 हविषा = हवि द्वारा 🌼 विधेम = हम धारण करें।
🕉️ मंत्र पर मीमांसा 🕉️
🏵️ हिरण्यगर्भ 🏵️ अर्थात् वह सत्ता जिसके गर्भ में प्रकाशक पदार्थ बीज रुप में थे। गर्भ तो गृह का ही रुपांतर है। जैंसे बच्चा पिता और माता के शरीर में गर्भरुप से विद्यमान होता है, वही उत्पत्ति या जन्म के समय *प्रजा* ( सन्तान) के रूप में आविर्भूत होता है। प्रजा के उत्पन्न होने से पिता *प्रजापति* हो जाता है।इसी प्रकार प्रजापति के गर्भ में सृष्टि का बीज रुप विद्यमान था अर्थात् सृष्टि के पहले *हिरण्यगर्भ* था। इस मंत्र का अंतिम पद अत्यंत 🌻 रहस्य मय व आह्लादित 🌻 करने वाला है। जिसमें 🌹 लाजबाव प्रश्न का लाजबाव उत्तर 🌹 है।
🌻कस्मै देवाय हविषा विधेम?🌻हे मनुष्यों वह ईश्वर कौन हैजिसकी हम प्रतिदिन 🍁 स्तुति प्रार्थना व उपासना करें? इसी में उत्तर छिपा है *क: = जो सुख स्वरूप ईश्वर* है सभी मनुष्य प्रातः -सायं उसी हृदय में विराजमान *हिरण्यगर्भ* ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करें। इसके अतिरिक्त कोई उपासना के योग्य नहीं है।
आचार्य सुरेश जोशी
*वैदिक प्रवक्ता*