एक साल में एक बार ही आता है दो जून, संजय पुरुषार्थी

सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता।
इस दुनिया में इंसान भले ही कई योग्यताओं का मालिक हो, लेकिन आप यकीन मानिए जो इंसान साहित्य और अदब का धनी होता है, उससे बड़ी शायद कोई नेमत उस इंसान के लिए नहीं हो सकती। ऐसे नामों में एक नाम आता है प्रयाग राज की धरती से जो एक बेहतरीन मंच संचालक के साथ पर्यावरण संरक्षण पर अपनी पूरी ऊर्जा लगाने के साथ एक बेहतरीन कवि की शक्ल में अपने वजूद को कायम किए हुए हैं आज ऐसे ही सफल इंसान की एक कविता आपके समक्ष लेकर आया हूं। जो निसंदेह आपके दिल को छू जायेगी।
मई महीना चला गया आ पहुँचा है जून l*
*गर्मी ऐसी पड़ रही खौल रहा है खून ll*

*मेहनतकश को देखिए कितना करता काम l*
*तब जा कर पाता कहीं रोटी दाल व नून ll*

*रोटी आज न खा सके तो पछताएंगे आप l*
*एक साल में एक बार ही आता है दो जून ll*

*खाके रोटी दो जून की मिलता गजबै आराम l*
*टनाटंन जब पेट हो तो क्यों खिसके पतलून ll*

*मई महीना क्या गया चला गया आराम l*
बिजली भी मैके गई ‘औ’ मचछर चूसें खून ।।
कविता या शायरी यूं तो अपने आप में एक बहुत बड़ी नेमत है लेकिन खासकर जब रचनाएं समसामईक विषयों पर होती हैं। तो उसका मज़ा कुछ और ही होता है। मेरी नज़र में संजय जी की यह कविता यही दर्शाती है।

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