सम्बन्धों का बन्धन उसने पैरों में डाला ऐसे
अन्दर – अन्दर टूट गई हूं मोती की माला जैसे
कर्मभूमि के पावन पथ पर पूर्ण समर्पण है मेरा
अनुशासन संदेश सिखाता वो जो दर्पण है मेरा
हर सांचे में ढल जाती हूं जिसने भी ढाला जैसे
अन्दर -अन्दर टूट गई हूं मोती की माला जैसे।
सम्बन्धों का बन्धन उसने पैरों में डाला ऐसे
अन्दर -अन्दर टूट गई हूं मोती की माला जैसे।
फुलवारी से फूल चुराने इक दिन आया सौदागर
जज़्बातों से खेले जैसे ठगने आया बाजीगर
तोड़-तोड़के कलियां कुचले हृदय चुभे कांटा जैसे
अन्दर – अन्दर टूट गई हूं मोती की माला जैसे।
सम्बन्धों का बन्धन उसने पैरों में डाला ऐसे
अन्दर – अन्दर टूट गई हूं मोती की माला जैसे।
धैर्य और मर्यादा की मूरत सी अब गढ़ना होगा
रेगिस्तानी थारों में भी फूल मुझे चुनना होगा
सारे ग़म को पी जाती हूं घूंट -घूंट हाला जैसे
अन्दर – अन्दर टूट गई हूं मोती की माला जैसे।
सम्बन्धों का बन्धन उसने पैरों में डाला ऐसे
अन्दर – अन्दर टूट गई हूं मोती की माला जैसे।
विश्वासों की चादर जर्जर तुरपाई दिल से करना
नेह दीप की बाती बनके घर की चौखट पे जलना
बूटे – बूटे टांक रही हूं सूई में धागा जैसे
अन्दर – अन्दर टूट गई हूं मोती की माला जैसे।
सम्बन्धों का बन्धन उसने पैरों में डाला ऐसे
अन्दर – अन्दर टूट गई हूं मोती की माला जैसे।
उषा श्रीवास्तव “उषाराज ”
गाज़ियाबाद,उत्तर प्रदेश
स्वरचित