मूर्ति पूजा के प्रश्नों का यथार्थ समाधान व समीक्षा -आचार्य सुरेश जोशी

🌼🌼 ओ३म् 🌼🌼
📗📗 संदर्भ अवश्य पढ़े 📗📗
श्रीमान अशोक जी आर्य आर्य समाज व वैदिक धर्म के दीवाने हैं। शंकराचार्य 🌸 अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रतापगढ़ 🌸 वाले प्रचार कर रहे हैं कि वेदों में मूर्ति पूजा है। आर्य समाज वालों को कुछ पता नहीं।इस पर उन्होंने आग्रह किया कि मैं उनके प्रश्नों का उत्तर दूं।काम बहुत कठिन था। प्रश्न कुल १४ थे।आधे आधे वेद मंत्रों के अनर्थ हो रहे थे।मगर अशोक जी की भावना देखकर ईश्वर से प्रार्थना की। ईश्वर कृपा से कुछ करने में समर्थ रहा। आपकी सेवा में प्रस्तुत है।आप स्वयं लाभ उठायें औरों का भी भला हो। आगे भी प्रेषित करें।
आभार।
आचार्य सुरेश जोशी वैदिक प्रवक्ता 🍁
🍁 शंकराचार्य को शास्त्रार्थ निमंत्रण 🍁
शंकराचार्य पीठ के उत्तराधिकारी प्रतापगढ़ के शंकराचार्य कहते हैं वेदों में मूर्ति पूजा का विधान है।जब से आर्य समाज का प्रादुर्भाव हुआ तब से इस विषय में लोग शंका करने लगे हैं। उन्होंने मूर्ति पूजा के प्रमाण वेद व उपनिषद् से उद्धृत किये हैं।
🪷 यथार्थ समाधान व समीक्षा 🪷
जितने भी प्रमाण आदरणीय शंकराचार्य महोदय ने दिये हैं मैं समस्त पाठक बंधुओं को उन्हीं के दिए प्रमाणों से ही सिद्ध करुंगा कि वेदों में एक भी मंत्र मूर्ति पूजा का समर्थन नहीं करता। अपितु वेदों में ईश्वर निराकार है। अवतार नहीं लेता।उसकी कोई मूर्ति नहीं है इस विषय में सैंकड़ों मंत्र हैं। आर्य समाज कोई मत,पंथ व संप्रदाय नहीं है अपितु 🏵️ सत्य सनातन वैदिक धर्म 🏵️ में महाभारत काल के बाद जो विकृति आ गई थी उसी को ठीक करने वाला महर्षि दयानंद सरस्वती जी का क्रांतिकारी आंदोलन मात्र है।
🧘 शंकराचार्य जी का कथन-१🧘
जब से आर्य समाज आया तब से यह प्रश्न उठ रहा है कि वेदों में मूर्ति पूजा नहीं है। सनातन धर्म बार-बार यह समझाता है कि वेदों में मूर्ति पूजा है। मगर आर्य समाजी मानते नहीं?
🪷🪷 हमारा- प्रति -उत्तर 🪷🪷
महोदय यह सत्य है आर्य समाज किसी भी बात को मानने से पहले जानता है। यदि बात सत्य होती है फिर मानता भी है। आर्य समाज ने देखा कि क्या वास्तव में वेदों में मूर्ति पूजा है? फिर उसने चारों वेदों के यौगिक अर्थों को खोजा तो जाना कि चारों वेदों में मूर्ति पूजा का एक भी मंत्र नहीं है फिर संपूर्ण विश्व को प्रमाणों के साथ बताया कि वेदों में 📚 मूर्ति पूजा 📚 नहीं है।
🧘 शंकराचार्य जी का कथन -२🧘
देखो! वेदों में मूर्ति पूजा है।
ओं नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराचार्य च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।।
यजुर्वेद ०,१६/४१
🪷🪷 मेरा प्रति-उत्तर 🪷🪷
अब मैं आपको आदरणीय शंकराचार्य जी की चतुराई बता रहा हूं। उन्होंने अपने यू ट्यूब वीडियो पर अपने संस्कृत ज्ञान से अनभिज्ञ भक्तों के सामने उपरोक्त मंत्र को आधा पढ़ा और अर्थ भी नहीं बताया । और कह दिया देखो! यहां मूर्ति पूजा है।अब किसी भी भक्त ने यह नहीं पूछा कि गुरदेव यह किस वेद का मंत्र है और इसका अर्थ क्या है? और इनके वहां भक्तों में यह प्रचारित किया जाता है कि गुरु जी उतना ही पूछो जितना उनको अच्छा लगे! नहीं तो वो नाराज़ होकर श्राप दे देंगे!
हमने इस मंत्र को आधा सुनकर ही समझ लिया कि यह मंत्र किस वेद का है और उसे पूरा लिखकर ऊपर भेजा है।अब इस मंत्र का अर्थ देखें!
नम: शम्भवाय च= जो ईश्वर सुख स्वरूप,मय:भवाय च= संसार के उत्तम सुखों को देने वाला, नमः शंकराय च= कल्याण का कर्ता, मोक्ष स्वरुप,धर्म युक्त कार्यों को ही करने वाला, मयस्कराय च= अपने भक्तों को सुख देने वाला और धर्म कार्यों में युक्त करने वाला, नमः शिवाय च शिवतराय च= अत्यंत मंगल स्वरुप और धार्मिक मनुष्यों को सुख देने वाला है,उसको हमारा बारम्बार नमस्कार हो!
इस मंत्र में कहीं भी मूर्ति पूजा नहीं है।पाठक स्वयं विचार करें।
🧘 शंकराचार्य जी का कथन -४🧘
वह ईश्वर आंख वाला है।कान वाला है।हाथ वाला है।इसका क्या अर्थ हुआ? जब मूर्ति है तभी तो कहा?
🪷🪷 मेरा प्रति -उत्तर 🪷🪷
यहां भी इनकी चतुराई देखें! बिना कोई वेद मंत्र बोलें ही हठपूर्वक शिष्यों से हामी भरवा रहे हैं। और शिष्यों में इतनी अंधश्रद्धा है कि वो ये नहीं पूछ सकते कि ये किस वेद मंत्र में है।
अधिक विस्तार भय से हम भी इसका उत्तर वेद मंत्र में न देकर तुलसीदास जी की एक चोपाई से देते हैं।इसके दो कारण हैं।
(१) ९५ % शंकाराचार्य भारत में रामचरित मानस की चोपाई ही बोलते हैं।
(२) साधारण जनता भी इस चौपाई को समझती है।
बिन पग,चलेऊं सुनेऊं बिन काना।
बिन कर कर्म करें विधि नाना।।
अर्थात् तुलसीदास जी ने भी कह दिया कि परमात्मा बिना कान के सुनता है।बिना पैर के चलता है।बिना हाथ के काम करता है।
🧘 शंकराचार्य जी का कथन-५🧘
आर्य समाजी के पास एक ही वेद मंत्र है। 🌴न तस्य प्रतिमा अस्ति🌴।उसकी मूर्ति नहीं है। जबकि इसका अर्थ है तुलना।यानि परमात्मा जैसा वहीं है और नहीं!
🪷🪷 मेरा प्रति-उत्तर 🪷🪷
यहां भी शंकराचार्य जी चतुराई के ही सहारे बचने का उपाय कर रहे हैं और मंत्र का केवल एक पद देकर आगे बढ़ रहे हैं जैंसे -तैंसे भक्तों से पिंड छुड़वा रहे हैं।पूरा मंत्र व अर्थ देखें!
न तस्य प्रतिमाsअस्ति यस्य नाम महद्यश:।
हिरण्यगर्भsइत्येष मा मा हिं सीदित्येषा यस्मान्न जातsइत्येष: ।। यजुर्वेद ३२/३
पाठक बंधु इसका पदार्थ देखें!
इस मंत्र में परमेश्वर कैसा है उसका वर्णन है।यस्य= जिसका, महत्= पूज्य बड़ा,यश:= कीर्ति करने वाला धर्म युक्त कर्म का आचरण ही, नाम= नाम स्मरण है जो, हिरण्यगर्भ:= सूर्य बिजली आदि पदार्थों का आधार,इति= इस प्रकार,एष:= अंतर्यामी होने से प्रत्यक्ष जिस की ,मा= मुझ को,मा,हिंसीत्= मत ताड़ना दे,इति= इस प्रकार,एसा=यह प्रार्थना वा बुद्धि ओर ,यस्मात् = जिस कारण,न= नहीं,वात:= उत्पन्न हुआ, इति=इस प्रकार,एष:= वह परमात्मा उपासना के योग्य है।तस्य= उस परमेश्वर की,प्रतिमा= प्रतिमा — परिमाण उसके तुल्य अवधि का साधन प्रतिकृति, मूर्ति वा आकृति,न अस्ति= नहीं है।
भावार्थ:- जो कभी देहधारी नहीं हुआ जिसका कुछ भी परिमाण सीमा का कारण नहीं है जिसकी आज्ञा का पालन ही नाम स्मरण है जो उपासना किया हुआ अपने उपासकों पर अनुग्रह करता है। वेदों के अनेक स्थलों में जिसका महत्व कहा गया है जो नहीं मरता न विकृत होता न नष्ट होता उसी की उपासना निरंतर करो जो इससे भिन्न की उपासना करोगे तो इस महान पाप से युक्त हुए आप लोग दुख क्लेशों से नष्ट होगे।
अतः स्पष्ट हो गया कि इस मंत्र में भी मूर्ति पूजा नहीं है अपितु निषेध ही है।
🧘 शंकराचार्य जी का कथन -६🧘
ईश्वर सर्वव्यापक है तो मूर्ति में भी है। इसमें शंका ही नहीं है।
🪷🪷 मेरा प्रति-उत्तर 🪷 🪷
हम भी कहते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापक है। मगर अंतर इतना है आप ईश्वर सर्वव्यापक है केवल मान रहे हैं मगर हम पहले जान रहे हैं फिर मान रहे हैं। मतलब सर्वव्यापक का अर्थ जो आप समझ रहे हैं वो नहीं अपितु इस प्रकार है।
ईश्वर कण -कण में है।
मगर कण -कण ईश्वर नहीं है।।
या इस प्रकार समझें……
हर कंकर में शंकर है।
मगर हर कंकर, शंकर नहीं है।।
यही वैदिक अर्थ है सर।व्यापक का कि मूर्ति के बाहर-भीतर,ऊपर -नीचे, आगे -पीछे, दाएं- बाएं ईश्वर है मगर मूर्ति ईश्वर नहीं है। मूर्ति अलग पदार्थ है। ईश्वर अलग पदार्थ है। मूर्ति जड़ पदार्थ है और ईश्वर चेतन पदार्थ है। ईश्वर सर्वव्यापक है मूर्ति एकदेशीय है।
🌴🌴🌴 विशेष 🌴🌴🌴
ये उत्तर तो शंकराचार्य जी के उन प्रश्नों का है जो उन्होंने वीडियो में कहीं है। वीडियो संलग्न है।
इसके बाद उन्होंने जो प्रश्न कागज पर लिखें हैं उनके उत्तर नीचे दिए जाते हैं।
🌲 शंकराचार्य जी का प्रश्न -१🌲

ऋग्वेद मंडल एक। मंत्र संख्या एक
हे अग्निदेव!हम सब आपकी स्तुति करते हैं आप अग्निदेव,यज्ञ के पुरोहितों,सभी देवताओं,सभी ऋत्विजो,होताओं और याजकों को रत्नों से विभूषित कर उनका कल्याण करें यह मनुष्य की प्रथम मूर्ति पूजा है।
🏵️🏵️ मेरा प्रति -उत्तर 🏵️🏵️
यहां भी उसी चतुराई को दिखा रहे हैं। मंत्र दिया नहीं। अर्थ का अनर्थ किया है और शिष्य 🌿सत्य वचन महाराज 🌿 वाले हैं।जान हमारी निकल रही है परंतु परमेश्वर की आज्ञा मानकर हम खुशी खुशी वार झेल रहे हैं।
अब आपको इस मंत्र को प्रमाण। अर्थ सहित दे रहे हैं कि इस मंत्र का मूर्ति पूजा से दूर तक कोई संबंध नहीं है। ध्यान से देखें 🌴
ओं अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।होतारं रत्नधातमम्।।
ऋग्वेद मंडल १/१/१
यज्ञस्य= हम लोग विद्वानों के सत्कार संगम महिमा और कर्म के, होतारम्= देने तथा ग्रहण करने वाले,पुरोहितम्= उत्पत्ति के समय से पहिले परमाणु आदि सृष्टि के धारण करने और ऋत्विजम् = बारंबार उत्पत्ति के समय में स्थूल सृष्टि के रचने वाले तथा ऋतु-ऋतु में उपासना करने योग्य , रत्नधातमम्= और निश्चय करके मनोहर पृथिवी वा सुवर्ण आदि रत्नों के धारण करने वा,देवम्= देने तथा सब पदार्थों के प्रकाश करने वाले परमेश्वर की,ईळे= स्तुति करने हैं।
🌲 शंकराचार्य जी का प्रश्न -२🌲
ईशावास्य इदं सर्वं।।
यह संसार उस अव्यक्त की मूर्ति है।
🏵️🏵️ हमारा प्रति -उत्तर 🏵️ 🏵️
यहां भी मंत्र पूरा नहीं दिया और अर्थ का अनर्थ किया है।सत्य अर्थ व मंत्र इस प्रकार है।
ईशावस्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य
स्विद्धनम्।।
यजुर्वेद ४०/१ और ईशोपनिषद -१
पदार्थ:- यत्= इदम् प्रकृति से लेकर पृथ्वी पर्यंत,सर्वम्= सब,जगत्याम् = प्राप्त होने योग्य सृष्टि में जगत् = चर प्राणिमात्र,ईशा= संपूर्ण ऐश्वर्य से युक्त सर्वशक्तिमान परमात्मा से, वास्यम्=आच्छादन करने योग्य अर्थात् सब ओर से व्याप्त होने योग्य है।तेन्= उस त्यक्तेन= त्याग किये हुए जगत् से, भुञ्जीथा:= पदार्थों के भोगने का अनुभव कर किंतु,कस्य,स्वित् =किसी के भी ,धनम्= वस्तु मात्र की,मा= मत, गृध:= अभिलाषा कर।।
अर्थात् जो मनुष्य ईश्वर से डरते हैं कि ईश्वर हमको सदा,सब ओर से देखता है।यह जगत् ईश्वर से व्याप्त और सर्वत्र ईश्वर विद्यमान है।इस प्रकार व्यापक अन्तर्यामी परमात्मा का निश्चय करके भी अन्याय के आचरण से किसी का कुछ भी द्रव्य ग्रहण नहीं किया चाहते हैं वे धर्मात्मा होकर इस लोक और परलोक में मुक्ति रूप सुख को प्राप्त कर के सदा आनंद में रहते हैं। यहां मूर्ति पूजा का कोई प्रकरण ही नहीं है।
🌲 शंकराचार्य जी का प्रश्न -३🌲
श्वेताश्वतर उपनिषद् अध्याय-४ के २.३.४ श्लोक में मूर्ति पूजा है।
🏵️🏵️ हमारा प्रति-उत्तर 🏵️🏵️
यहां तो कमाल ही कर दिया। श्लोक का परिचय देकर ही शिष्यों का मौन कर दिया। शिष्यों ने यह भी पूछा कि वो श्लोक भी सुना दीजिए।
हमने इन श्लोकों को खोज लिया। मगर इन श्लोकों में ईश्वर के अलंकारिक रचना का वर्णन है मूर्ति पूजा का कुछ भी वर्णन नहीं है।समयाभाव व विस्तार भय से हम भी उन श्लोकों को यहां नहीं दे रहे हैं। यदि आवश्यकता पड़ेगी तो प्रस्तुत कर दिया जाएगा।
🌲 शंकराचार्य जी का प्रश्न -४🌲
संवत्सरस्य प्रतिमा-अथर्वेद३/१०/३
अर्थात् हे रात्रे! संवत्सर की प्रतिमा! हम तुम्हारी उपासना करते हैं।तुम हमारे पुत्र,पोत्रादि कै चिर आयुष्य बनाओ और पशुओं से हमको सम्पन्न करो!
🏵️🏵️ हमारा प्रति -उत्तर 🏵️ 🏵️
यहां भी मंत्र का अनर्थ किया है।लेख बहुत बड़ा होने से हम मंत्र का सही अर्थ लिख रहे हैं।
इस मंत्र में मूर्ति पूजा नहीं प्रकृति से पुष्टि को बढ़ाने के लिए प्रकृति की महानता का वर्णन करके उससे लाभ उठाने की प्रेरणा की गई है।
अनन्त परमेश्वरी प्रकृति के सूक्ष्म और स्थूल रूप के ज्ञान से उपकार लेकर हम अपनी संतान के सहित धनी, स्वस्थ, और चिरंजीवी बने रहें। मूर्ति का कोई प्रकरण ही नहीं है मगर जब शंकराचार्य जी के शिष्य संस्कृत से अनभिज्ञ हैं तो काला अक्षर भैंस बराबर ही है।
🌲 शंकराचार्य जी का प्रश्न -५🌲
एह्यश्मानमा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनू:
अथर्ववेद २/१३/४
हे भगवान! आइये और इस पत्थर की बनी मूर्ति में अधिष्ठित होइये अथवा यह शरीर पत्थर की मूर्ति बन जाए।
🏵️🏵️ हमारा प्रति -उत्तर 🏵️ 🏵️
शंकराचार्य जी महाराज को पढ़कर लालबुझक्कड़ की कहानी याद आ रही है। इस मंत्र में मूर्ति पूजा का नहीं। गुरुकुल में पढ़ रहे ब्रह्मचारी का वर्णन है।
???? आश्चर्य ही आश्चर्य???
इसी मंत्र से सारे पौराणिक लोग मूर्ति पूजा जबरदस्ती करते हैं इसलिए हमें इस मंत्र के सही अर्थ हेतु मंत्र लिखने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। आनंद लीजिए और पाखंड कैसे होता है समझ जाइए।
ओं एह्यश्मानमा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनू:।
कण्वन्तु विश्वदेवा: आयुष्टे शरद:शतम्।।
पहले पौराणिक अनर्थ देखें…….
हे ईश्वर आप इस पत्थर में विराजमान हो।यह पत्थर आपका शरीर हो।
🌻 शुद्ध यौगिक अर्थ देखें 🌻
एसिड= हे ब्रह्मचारी तू आ,अश्मानम् =<इस शिला पर आतिष्ठत् = चढ़।ते = तेरा तनू:= शरीर अश्मा= शिला जैंसा दृढ़ ,भवत् = होवे,विश्वे= सर्वोत्तम गुण वाले विद्वान और पदार्थ ,ते= तेरे,आयु= आयु को, शतम्=सौ,शरद:= ऋतुओं तक दीर्घायु करें!
अर्थात् ब्रह्मचारी को शरीर को व्यायाम, प्राणायाम,योग से शरीर को पत्थर जैसा दृढ़ बनाने की प्रेरणा है न कि मूर्ति पूजा।
🌲 शंकराचार्य जी का प्रश्न -६🌲
सहस्त्रस्य प्रमासि। यजुर्वेद १५/६५
हे परमेश्वर!आप सहस्त्रों की प्रतिमा मूर्ति हैं।
🏵️🏵️ हमारा -प्रति-उत्तर 🏵️🏵️
विस्तार भय से हम सीधे वैदिक अर्थ ही प्रस्तुत कर रहे हैं कि इस मंत्र का भी मूर्ति पूजा से कोई मतलब नहीं है।
इस मंत्र में शंकराचार्य जी महाराज 🍁वाचकलुप्तोपमालंकार 🍁 है। मंत्र का विषय है कि मनुष्यों को क्या करना चाहिए। इसमें पूर्व मंत्र से परमेष्ठी,सादयतु इन दो पदों की अनुवृत्ति आती है।तीन साधनों से मनुष्य के व्यवहार सिद्ध होते हैं।एक तो यथार्थ विज्ञान,दूसरा पदार्थ तोलने के लिए तोल के साधन बांट और तराजू आदि। अर्थात् इसमें शिशिर ऋतु का वर्णन है न कि मूर्ति पूजा का।
🌲 शंकराचार्य जी का प्रश्न -७🌲
अर्चत प्रार्चत -अथर्ववेद २०/९२/५
शंकराचार्य जी का अनर्थ – हे बुद्धिमान मनुष्यों! उस प्रतिमा का पूजन करो, भली भांति पूजन करो!
🏵️🏵️ हमारा -प्रति-उत्तर 🏵️ 🏵️
इस मंत्र में मूर्ति पूजा नहीं अपितु राजा व प्रजा के लिए उपदेश है। मनुष्यों को चाहिए कि वे अपने पुत्र -पुत्रियों सहित प्रत्येक क्षण में प्रत्येक पदार्थ में, प्रत्येक कर्म में परमात्मा की शक्ति को निहार कर आत्मा की उन्नति करें।
🌲 शंकराचार्य जी का प्रश्न -८🌲
ऋषीणां प्रस्तरोऽसि.. अथर्ववेद १६/२/३
शंकराचार्य जी का अनर्थ…..
हे प्रतिमा तू ऋषियों का पाषाण है ।तुझ दिब्य पाषाण के लिए नमस्कार है।
🏵️🏵️ मेरा प्रति उत्तर 🏵️🏵️
यहां तो शंकराचार्य जी ने हद ही पार कर दी।अभी तक तो ईश्वर की ही मूर्ति बता रहे थे। यहां मूर्ति को ऋषियों का पाषाण कह दिया। हास्यास्पद है।
वैदिक अर्थ देखें….
ओं ऋषीणां प्रस्तरोऽसि नमोऽस्तु दैवाय प्रसृतराय।।
ईश्वर, ऋषीणाम् = इंद्रियों का ,प्रस्तर:= फैलाने वाला ,असि= है।दैवाय= दिव्य गुण वाले।प्रस्तराय= फैलाने वाले तुझको,नमः:= नमस्कार ( सत्कार) होवे।
अर्थात् मनुष्य उस परमात्मा को सदा धन्यवाद दें कि उसने उनको वेद शास्त्र सुनने, विचारने और उपकार करने के लिए अमूल्य श्रवण आदि इंद्रियां दी है।।
🌹🌹 उपसंहार के वचन 🌹🌹
[१] शंकराचार्य महाराज ने छ; प्रश्नों का उत्तर वीडियो में भक्तों के दिए हैं। हमने पहले वीडियो वाले प्रश्नों के ही उत्तर दिए हैं। वीडियो भी साथ में हैं।
[२] आठ(८) प्रश्नों को भक्तों की ओर से कागज पर पूछा है। हमने बाद में आठ प्रश्नों के उत्तर दिए हैं।
[३] शंकराचार्य जी ने मंत्रों के ऋषियों व देवताओं की उपेक्षा करके अर्थ किये इसीलिए उन्होंने अनर्थ करके जबरदस्ती वेद मंत्रों में मूर्ति पूजा दिखाने का अवैदिक कर्म किया है?
[४] जो भक्त हिन्दी भाषा में प्रश्न कर रहे हैं और जो संस्कृत भाषा जानते ही नहीं उन्हें मनमाने तरह से वेद मंत्रों को सुनाकर मुख बंद कराना ही उनका लश्र्य रहा है।
[५] एक प्रश्न ही मूल में था कि क्या वेदों में मूर्ति पूजा है? उसका उत्तर भी एक ही होना चाहिए था मगर सही उत्तर देने पर और प्रश्न भक्त न पूछें इसलिए उनको इतना उलझा दिया कि वो दूसरा प्रश्न कर ही नहीं सके!
[६] आर्य समाजी कहां इतनी खोज करेगा सोचकर अनेक मंत्रों को एकांश देकर भ्रमित किया मगर चुकी कृपा से हमारा पुरुषार्थ काम कर गया है।अब श्रोता निष्पक्ष न्याय करें और सत्य को ग्रहण करें इतना ही हमारा अभिप्राय है किसी कि मान-अपमान नहीं।
विदुषामनुचर:
आचार्य सुरेश वैदिक प्रवक्ता
आर्यावर्त साधना सदन पटेल नगर दशहराबाग बाराबंकी उत्तर प्रदेश।

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