
अनुराग लक्ष्य, 17 अप्रैल
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुम्बई संवाददाता।
बीती रात धारावी के पीला बंगला स्थित आंबेडकर सभागार में ईद मिलन समारोह के मौके पर एक गंगा जमुनी मुशायरा कवि घायल कानपुरी के संयोजन में आयोजित किया गया। जिसका सफल संचालन पूर्वांचल के कोहनूर शायर गीतकार और अनुराग लक्ष्य पत्रिका के सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने किया। बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे मानव कल्लेयाड संघर्ष मंच फाउंडेशन मुंबई के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष नईम खान साहब।
मुशायरे का आगाज़ जाफर बलरामपुरी के नातिया कलाम से हुआ, तत्पश्चात उन्होंने अपना कलाम,
,,,हुआ हूं कैद घर में जबसे जाफर,
हवा मुझसे शिकायत कर रही है,,
सुनकर महिफिल को रौनक बख्शी।
इसी क्रम में दिनेश चंद बैसवारी ने अपना कलाम,
,,, कुरआन और वेद को पढ़कर कभी गीता पढ़ी जाए,,
सुनकर सामाजिक विसंगतियों पर परहार किया।
कोहना मश्क शायर ज़ाकिर हुसैन रहबर ने अपना कलाम,
,,,करो हिम्मत वोह पैदा, हर मुसीबत रास्ता दे दे,
तुम्हारे हौसले के सामने मंज़िल भी झुक जाए,,,
सुनाकर खूब दाद ओ तहसीन हासिल किया।
इसी क्रम में शायरा पूनम विश्वकर्मा ने एक से एक खूबसूरत ग़ज़लों और गीतों से महफिल और मुशायरे को एक नई ऊंचाई दी,,उन्होंने अपना कलाम,
,,,रखती ज़ख्मों का तो हिसाब नहीं
ज़िंदगी तेरा भी जवाब नहीं
खार ही खार क्यों है दामन में
एक औरत हूं मैं गुलाब नहीं,,,
सुनाकर साम्यीन के दिलों में उतर गईं।
मुशायरे का सफल संचालन करते हुए अपने कई मेयारी कलाम के साथ शायर एवम गीतकार सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने सभागार में खूब तालियां बजवायीं, खासकर उनका यह कलाम,
,,, कभी ईदें महकती हैं कभी होली महकती है
मिलें हिंदू मुसलमां जब तो यह बोली महकती है
कोई दुश्मन भी घर आए तो यह महसूस होता है
कि स्वागत में मेरे आंगन की रंगोली महकती है,,
सुनाकर मुशायरे को एक नई ऊंचाई परदान की।
और, अंत में, कवि एवम गीतकार राम जी कनौजिया का कलाम भी खूब सराहा गया इन पंक्तियों के साथ,,
,,,दिलों से जब मिट नफ़रत तो कोई बात बने,
हो जब सबकी यही हसरत तो कोई बात बने,,,
सुनाकर आज के राजनैतिक परिवेश की तस्वीर पेश की।
और अंत में आयोजक और मुशायरे की सदारत कर रहे घायल कानपुरी ने भी अपने कलाम से खूब दाद ओ तहसीन हासिल किया।