ग़ज़ल
अख़बार में ख़ुद देख लो ये कैसी ख़बर है,
बदहाल आज हिन्द का हर एक बशर है।
फिरता हूँ जो सहरा में मैं दीवानों के मानिन्द,
सब मेरी ही अंग्रेजी दवाओं का असर है।
सढ़सठ बरस गुज़र गये मंजिल नहीं मिली,
अल्लाह जाने कैसा हमारा ये सफ़र है।
अब आँख दिखाने लगा मुझ पर मेरा नाती,
उस पर मुझे लगता है कि ये माँ का असर है।
हम को तो जेहादी का लक़ब दे दिया तुम ने,
रंगून में जो लेटा है वो किस का ज़फर है।
अब मुस्तहक़ नहीं है मुआफ़ी का वो सनम,
उस के किये गुनाह की अब सब को ख़बर है।
बस इसलिये मोहतात बहुत रहता हूँ नदीम,
इक बदनज़र की हर घड़ी बस मुझ पे नज़र है।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥