रंगों की भाषा है अपनी बोली है, जीवन की सौगात निराली होली है, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,

मुम्बई संवाददाता ।
,,, कभी ईदें महकती हैं कभी होली महकती है
मिलें हिंदू मुसलमां जब तो यह बोली महकती है
कोई दुश्मन भी घर आए तो यह महसूर होता है
कि स्वागत में मेरे आंगन की रंगोली महकती है,,,
जिस तरह फूल में खुशबू दूध में मक्खन पत्थर में अग्नि और मेंहदी में लाली छिपी रहती है उसी तरह इस देश के हिंदू और मुस्लिम भी एक दूसरे के दिलों में रचते और बस्ते हैं। और यही सच्चाई है।
हां, वक्त के कुछ फिरऔन और रावडो को यह बात अब खलने ज़रूर लगी है, जिससे हमारे मुल्क की गंगा जमुनी तहज़ीब आज खतरे में दिखाई दे रही है। लेकिन अगर हम कलमकार हैं अदीब हैं फनकार हैं तो यह हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम इस नफरत की खाई को पाटकर इस देश में अमन और शांति की शमां को रोशन करके इंसानियत और भाईचारे को ज़िंदा रखें। क्योंकि,
,,,, रंगों की भाषा है अपनी बोली है,
जीवन की सौगात निराली होली है,
गले मिले जब हिंदू मुस्लिम मुझे लगा,
नफ़रत की हर गांठ सभी ने खोली है ,,,

वोह अपनी ईद में तुझको अगर बुलाता है,
तो तेरी होली में अब भी गुलाल लेता है,
मिटाने के लिए नफरत दिलों से इंसां के,
यहां तलक कि वोह पूजा की थाल लेता है,,

,,,,,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,,

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