शेर रंगीन है रंगीन कहा है मैं ने।रूपेंद्र नाथ सिंह रूप

ग़ज़ल 

आपके शेर पे तहसीन कहा है मैं ने।
शेर रंगीन है रंगीन कहा है मैं ने।

झूठ कहता मैं नहीं सच की है आदत मेरी।
रात संगीन है संगीन कहा है मैं ने।

दीन की राह पे चलता हूं नहीं मैं ख़ुद ही।
दूसरों को भी न बेदीन कहा है मैं ने।

आपके रुख़ पे उदासी की झलक मिलती है।
ग़मज़दा देख के ग़मगीन कहा है मैं ने।

आपके शेर को कितना मैं समझ पाया हूं।
देखिए शेर पे तज़मीन कहा है मैं ने।

हाथ से पांव से माज़ूर हुआ हूं कब से।
यूं ही ख़ुद को तो न बलहीन कहा है मैं ने।

चार का साथ मयस्सर न अगर रूप मुझे।
झूठ क्या ख़ुद को जो धनहीन कहा है मैं ने।

रूपेंद्र नाथ सिंह रूप

 

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