ग़ज़ल
हर जानिब नुकसान हुआ है सड़कों पर
नफ़रत का उत्पात मचा है सड़कों पर
नींद से उठ कर रोज़ी रोटी की खातिर
मेहनत कश मज़दूर चला है सड़कों पर
कोरोना में हर जानिब सन्नाटा था
ऐसा भी इक दौर हुआ है सड़कों पर
मोटर गाड़ी इतनी हैँ के लोगों का
चलना अब दुशवार हुआ है सड़कों पर
घर से निकलो देखो बाहर का मनज़र
मन मोहक बाजार सजा है सड़कों पर
असलम तारिक