ग़ज़ल
मैं अपने गांव में फिर मुस्कुरा के लौट आया
मैं चंद रोज़ नगर में बिता के लौट आया
सियाह अब्र हटा फिर से रोशनी लौटी
फ़लक पे चांद तभी जगमगा के लौट आया
सुकूनो चैन तो जाते रहे मुहब्बत में
न जाने और मैं क्या क्या गंवा के लौट आया
सिखा रहे हैं वही लोग अब ज़माने को
सबक तमाम जिन्हें मैं सिखा के लौट आया
शराब पी के अभी मयक़दे से निकला था
अज़ीब रिन्द है फिर लड़खड़ा के लौट आया
उसे मुआफ़ ज़माना कभी नहीं करता
जो पीठ जंग में अपनी दिखा के लौट आया
किसी की मौत पे आंसू बहाने वालों को
‘अहम’ भी सिर्फ़ दिलासा दिला के लौट आया
सुरेंद्र सिंह अहम