मेरा ज़ख्म धोने वाले तेरा हाथ जल न जाए

 

 

ये मुहब्बतों का जादू, कहीं तुझ पे चल न जाए
मेरा ज़ख्म धोने वाले तेरा हाथ जल न जाए

ये धुवां धुवां सा मौसम, ये तेरी जुदाई का ग़म
मुझे डर ये लग रहा है , मेरा दम निकल न जाए

कहीं तू भी दोस्ती में, मुझसे दगा न कर दे
मेरी हसरतों का सूरज सरे शाम ढल न जाए

मेरी आँखों से बहेगा, मेरा खूने दिल मुसलसल
तेरी याद का ये पत्थर, जब तक पिघल न जाए

ये कसक जो इश्क़ की है, यही मेरी ज़िन्दगी है
कहीं चैन आ न जाए, कहीं दिल संभल न जाए।।

निभा चौधरी
कवियत्री , आगरा
विधा, शृंगार
गीत , गज़ल, मुक्तक,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *