साहित्य के बाज़ारूपन से आहत हैं, कवित्री रश्मि वर्मा,

अनूराग लक्ष्य, 18 दिसंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुम्बई संवाददाता ।
हिंदी साहित्य का संसार यूं तो बहुत ही विराट और विशाल है। जो आज भी सूर, तुलसी, कबीर और निराला के नाम से जाना और पहचाना जाता है। जो रहती दुनिया तक हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणा श्रोत रहेंगे, लेकिन आज हमारा जो वर्तमान हिंदी साहित्य है, निश्चित ही उसके बिगड़े स्वरूप को पढ़कर और देख कर जो पीड़ा होती है, उसे शब्दों में बयां कर पाना निहायत ही दुर्लभ है।
साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर हिंदी कवि सम्मेलनो में जो फूहड़ता, और हास्य के नाम पर जो लोग सुना रहे हैं। साथ ही जो लोग उसे सुन रहे हैं। तब यह प्रश्न तो उठता ही है। कि क्या यही हमारा हिंदी साहित्य है।
बिहार के पटना में जनमीं और उच्च शिक्षा प्राप्त हिंदी साहित्य की जानी मानी कवित्री रश्मि वर्मा हिंदी साहित्य के इस रवैए और बाज़ारु पन से बहुत आहत हैं। इस विषय पर फोन पर अनुराग लक्ष्य के संवाद्दता सलीम बस्तवी अज़ीज़ी से एक लंबी वार्ता हुई, जिससे पता चला कि वोह दर्जनों राष्ट्रीय साहित्यिक सम्मान से नवाजी जा चुकी हैं। साथ ही बिहार के साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर साहित्यिक चर्चाओं और परिचर्चाओं में अपना अहम मुकाम रखती हैं। इसी साहित्यिक परिवेश पर कटाक्ष करती हुई उनकी एक रचना से मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी, आप पाठकों को भी रूबरू करा रहा हूं ।
1/ क्या मेरा साहित्य एक बाज़ार है,
हर गली में इक नया खरीदार है ।
2/ जिस तरफ भी देखिए फैले हैं यह,
चल पड़ा अब खूब यह व्यापार है ।
3/ है पुरोधा जो यहां साहित्य का,
वक्त के हाथों हुआ लाचार है ।
4/ सरस्वती के पुत्रों क्यों मौन हो,
अफसोस कि यह तंत्र भी बेकार है ।
5/ जो गिरावट आ गई साहित्य में,
दिल मेरा इस से बहुत बेज़ार है ।
6/ मैं लडूंगी खुद से ,रश्मी, अंत तक,
कैसे मानूं कि क़लम बीमार है ।
,,,,,,पेशकश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी, मुंबई संवाददाता,,,,,

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