सनातन समाज पार्टी ने किया ‘राष्ट्रीय सनातन बोर्ड’ गठन का संकल्प, धर्म के संरक्षण के लिए संतों-विद्वानों को मिलेगी कमान
महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। सनातन समाज पार्टी (ससपा) के संस्थापक एवं शिवधाम काशी पीठाधीश्वर डॉ. श्री वत्साचार्य जी महाराज ने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा है कि यदि देश में सनातन समाज की सरकार बनती है, तो मंदिरों के प्रबंधन, संरक्षण और विकास के लिए एक ‘राष्ट्रीय सनातन बोर्ड’ का गठन किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिरों की आय का उपयोग केवल सनातन धर्म, गुरुकुलों और गोसंरक्षण जैसे पुनीत कार्यों में ही किया जाएगा। धर्मगुरुओं के हाथों में होगी बोर्ड की बागडोर डॉ. वत्साचार्य जी महाराज ने बताया कि प्रस्तावित राष्ट्रीय सनातन बोर्ड में चारों शंकराचार्यों सहित सभी प्रमुख सनातन संप्रदायों के धर्माचार्य, संत-महात्मा और विद्वानों को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि मंदिरों का प्रबंधन सरकारी नियंत्रण के बजाय समाज के संतों और विद्वानों द्वारा संचालित होना चाहिए ताकि उनकी पवित्रता और गरिमा बनी रहे।
मंदिरों की संपदा का होगा सदुपयोग महाराज ने इस बात पर जोर दिया कि मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित धनराशि भगवान और धर्म के कार्य के लिए होती है। उन्होंने कहा, “आज दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि मंदिरों की अपार संपदा का उपयोग समाज के व्यापक उत्थान में नहीं हो पा रहा है। हमारा संकल्प है कि इस धन को गुरुकुलों के संचालन, संस्कृत भाषा के संवर्धन, वेद-शास्त्रों के अध्ययन, निर्धन विद्यार्थियों की शिक्षा और गोशालाओं के संरक्षण के लिए समर्पित किया जाए।विश्वगुरु भारत की गौरवशाली परंपरा का पुनरुद्धार अपने संबोधन में डॉ. वत्साचार्य जी ने प्राचीन भारत के गौरव का स्मरण कराते हुए कहा कि गुरुकुल, गोशालाएं और मंदिर ही हमारे समाज के आधार स्तंभ थे, जिन्होंने भारत को विश्वगुरु बनाया था। उन्होंने कहा कि आज समय की मांग है कि उसी गौरवशाली व्यवस्था को आधुनिक स्वरूप में पुनः स्थापित किया जाए।
राष्ट्रव्यापी आह्वान डॉ. वत्साचार्य जी महाराज ने देश भर के संतों, विद्वानों और सनातन समाज से इस अभियान में जुड़ने का आह्वान किया है। उन्होंने दोहराया, “मंदिरों का धन मंदिरों, गुरुकुलों, गोशालाओं, संस्कृत एवं सनातन संस्कृति के उत्थान में ही व्यय हो, यही हमारा एकमात्र संकल्प है। इस पहल को सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण और भावी पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।