
अनुराग लक्ष्य, 29 जून
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
यूँ तो शहर ए गोरखपुर में एक से एक नामचीन शायर पैदा हुए, जिनमें काफी मकबूल भी हुए, क्योंकि यह ज़मीन फिराक गोरखपुरी की ज़मीन रही है। जिन्होंने गोरखपुर को दुनिया ए अदब में मशहूर किया।
उसी फेहरिस्त में अगर आज नदीम अब्बासी, महेश अश्क, शमीम शहज़ाद , सर्वत जमाल जैसे शोअरा मकबूल ओ मारुफ हैं तो वहीं नई नस्ल के शायरों में सुम्बुल हाशमी को भी आज बहुत ही चाव से सुनते हैं। आइए आज उनकी एक खास ग़ज़ल पे नज़र डालते हैं।
1 / प्यार का नग़्मा सुनाऊंगा जिधर जाऊंगा,
दर्द ए दिल सबके मिटाऊंगा जिधर जाऊंगा ।
2 / मेरे वजूद में रहता है एक जोकर भी,
रोने वालों को हंसाऊंगा जिधर जाऊंगा ।
3/ मेरा यह हाल हुआ कैसे लोग पूछें अगर,
तेरा दीवाना बताऊंगा जिधर जाऊंगा ।
4 / हों वोह हिंदू के मुसलमान, हो के ईसाई,
मैं गले सबके लगाऊंगा जिधर जाऊंगा ।
5 / नफ़रतें छोड़ कर बातें करेंगे उल्फ़त की,
शमाँ इक ऐसी जलाऊंगा जिधर जाऊंगा ।
6 / गुलशन ए हिन्द का शैदाई मैं तो हूँ सुमबुल,
खार को फूल बनाऊंगा जिधर जाऊंगा ।
पेशकश,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी