………….जंतर-मंतर
गुलशन के सभी फूल क्यों मुरझाये हुये हैं,
रगंत नहीं है चेहरे पे कुम्हलाऐ हुये हैं।
सड़कों पे आ गए हैं सिस्टम से तंग आ कर,
और आप समझते हैं कि भटकाए हुये हैं।
पुरसान इनका कोई नही अपना पराया, अखबार भी लिखता है ये बहकाए हुये हैं।
सिस्टम से अब उम्मीद नहीं कोई भी इनको,
बस इसलिये ये फूल जलबलाए हुये हैं।
इंसाफ की खातिर ही तो निकले हैं सड़क पर,
मजलूमों पे क्यों जुल्म-ओ-सितम ढाए हुये हैं।
क्यों सामना करते नहीं इनका जनाब-ए-मन,
वादे पे आप क्यों इन्हें टरकाए हुये हैं।
अब आप हैं किस हाल में ये आप समझिये,
हम हैं कि नदीम अपने को बहलाऐ हुये हैं।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥