अनुराग लक्ष्य, 28 मई
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
इक आइना जो था मेरा वोह टूट गया है,
क्यों आज इस तरह वोह मुझसे रूठ गया है ।
आने से जिसके होती थी महफ़िल में रोशनी,
अफसोस उसका साथ आज छूट गया है ।।
जी हाँ, मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी आज अपने इस कलाम से ही बशीर बद्र साहब को खेराज ए अकीदत पेश करना मुनासिब समझा, क्योंकि वोह जिस अदब की नुमाइंदगी कर रहे थे। उसके लिए ज़रूरी था कि उपरोक्त कलाम से ही उनकी शख्सियत पर कोई बात की जाए।
एक दौर था जब वसीम बरेलवी, राहत इंदौरी और बशीर बद्र साहब की तिगड़ी जब किसी मुशायरे में दिख जाती थी, तो वह मुशायरा सुबह 4 बजे के पहले नहीं खत्म होता था।
अफसोस की बात है कि हमने आज शायरी की दुनिया का एक ऐसा नगीना खो दिया है। जिसकी भरपाई फिर कभी नहीं हो सकती है।
यूँ तो बशीर बद्र साहब की ग़ज़लों के ऐसे बेशुमार अशआर हैं जिन्हें आवाम बरसों याद रखेगी, लेकिन उनका यह शेर,
,,, उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए ,,,,
जब तक अदब ज़िन्दा रहेगा, उनका यह शेर भी ज़िंदा रहेगा।
अनुराग लक्ष्य परिवार उनके ग़म में शरीक हो कर उनके लिए दुआ ए मगफिरत करता है कि उन्हें जन्नत में आला से आला मुकाम रब्बुल इज़्ज़त अता करे ।
उनके अचानक हुए मौत की ख़बर ने अदब और साहित्य से जुड़े लोगों में दुख और ग़म का माहौल दिखाई दे रहा है।