-आर्ट वर्कशॉप में विशेषज्ञों ने परखीं युवा रेखाएँ
अयोध्या(। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग और राज्य ललित कला अकादमी, संस्कृति विभाग (उ.प्र.) के साझा मंच पर चल रही 20 दिवसीय ग्रीष्मकालीन चित्रकला कार्यशाला के 11वें दिन आज ऐसा ही कुछ देखने को मिला। पिछले दस दिनों से कैनवास पर रंग बिखेर रहे युवा छात्र-छात्राओं की कलाकृतियों की आज एक विशेष समीक्षा व विमर्श सत्र में विस्तृत तकनीकी और वैचारिक स्क्रूटनी की गई।
सत्र की मुख्य सूत्रधार और कला व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. मृदुला मिश्रा ने विद्यार्थियों के काम में दिख रहे विजुअल ट्रांसफॉर्मेशन की सराहना की। उन्होंने कहा, इन युवा कलाकारों ने पिछले दस दिनों में सिर्फ पेंटिंग्स नहीं बनाई हैं, बल्कि विचारों को आकार दिया है। कला आंतरिक एकाग्रता की यात्रा है; जब आप अपनी मौलिक सोच को बिना किसी झिझक के कैनवास पर उतारते हैं, तभी रंग जीवंत संवाद करने लगते हैं।
इस कला-विमर्श को और समृद्ध करते हुए डॉ. अलका श्रीवास्तव ने विद्यार्थियों से सीधा संवाद (इंटरैक्टिव टॉक) स्थापित किया। उन्होंने प्रत्येक विद्यार्थी से उनके चित्रों के पीछे की सोच को समझा। डॉ. श्रीवास्तव ने प्रेरित करते हुए कहा, हर रेखा और हर रंग के पीछे कलाकार का एक अदृश्य दर्शन होता है। तकनीकी रूप से सुदृढ़ होने के साथ-साथ अपनी मौलिक शैली को विकसित करना ही आपको भविष्य में एक विशिष्ट पहचान दिलाएगा।
वहीं, तकनीकी मूल्यांकन के सत्र में प्रो. प्रिया कुमारी ने एक-एक कृति का क्लोज-अप एनालिसिस किया। उन्होंने कंपोजिशन (संयोजन) के नियमों, लाइट एंड शेड (प्रकाश-छाया) के संतुलन और कैनवास पर रंगों के सही अनुपात (कलर हार्माेनी) पर व्यावहारिक सुझाव दिए। उनका मानना था कि एक बेहतरीन पेंटिंग वही है जो शब्दों की बैसाखी के बिना, केवल अपने विजुअल्स से दर्शक को बांध ले।
कार्यशाला की मुख्य प्रशिक्षक व आयोजन सचिव डॉ. रीमा सिंह ने विद्यार्थियों की प्रोग्रेस रिपोर्ट साझा करते हुए बताया कि बच्चों के काम में अब पारंपरिक भारतीय कला विधाओं की परिपक्वता साफ झलक रही है। उन्होंने कहा, हमारा ध्यान अब इन्हें तकनीकी रूप से अधिक समृद्ध करने पर है। विद्यार्थियों को कंपोजिशन और स्पेस मैनेजमेंट की बारीकियों के साथ-साथ पारंपरिक वाश पद्धति और आधुनिक कलर ब्लेंडिंग के प्रैक्टिकल कॉम्बिनेशन सिखाए जा रहे हैं, ताकि उनकी कला वैश्विक मानकों पर खड़ी उतर सके। अंत में, इस पूरे आयोजन को सुचारू रूप से संचालित कर रहीं कार्यशाला संयोजक डॉ. सरिता द्विवेदी ने विद्यार्थियों की शत-प्रतिशत ऊर्जा और उपस्थिति की सराहना की। उन्होंने कहा कि स्थापित कला विशेषज्ञों के साथ इस तरह का सीधा और खुला संवाद विद्यार्थियों के विजन को एक नया आकाश दे रहा है। यह कार्यशाला अब केवल सीखने का केंद्र नहीं, बल्कि इन बच्चों की अनूठी कलात्मक पहचान के विकास का गवाह बन रही है।आज के कला शिविर में स्नेहा दीक्षित, मुस्कान यादव, सपना पाल, विजमा देवी, जहीन, जान्हवी, हिबा, आकांक्षा, आकर्ष तिवारी, प्रिया गोस्वामी आदि के साथ 75 से अधिक छात्र- छात्राएं उपस्थित रहे।