का एहसानमाँ
माँ का एहसान क्या शब्दों में उतर पाएगा,
जितना लिखूँ, उतना ही मन और झुक जाएगा।
जब पहली बार आँखें खुलीं थीं मेरी,
सबसे पहले चेहरा वही मुस्कुराया था,
मेरी हर छोटी धड़कन के पीछे,
उसने अपना जीवन सजाया था।
नींद मेरी पूरी हो, इसलिए वो जागती रही,
भूख मेरी मिटे, इसलिए खुद को भूलती रही,
मेरी एक हँसी के बदले,
वो सौ आँसू चुपचाप सहती रही।
धूप मुझे ना लगे, खुद जलती रही,
ठंड मुझे ना छुए, खुद ठिठुरती रही,
मैं गिरूँ तो पहले उसका दिल टूटता,
मैं जीतूँ तो सबसे पहले वो झूमती रही।
मेरे हर दर्द को अपना बना लिया,
मेरे हर ख्वाब को अपना सजा लिया,
मैंने तो बस जीना सीखा,
उसने मुझे जीने का कारण बना दिया।
कर्ज़ उसका कोई चुका नहीं सकता,
उसका प्यार कोई माप नहीं सकता,
दुनिया की हर दौलत छोटी है उसके आगे,
माँ जैसा रिश्ता कोई पा नहीं सकता।
अगर भगवान कहीं है इस दुनिया में,
तो माँ के आँचल में ही बसता है,
जिसने माँ को समझ लिया सच में,
वो जीवन का हर अर्थ समझता है।
माँ का एहसान सिर्फ एहसान नहीं,
वो पूरी जिंदगी का आधार है,
हम जितना भी लिख दें उसके लिए,
हर शब्द फिर भी उधार है।
स्वरचित /मौलिक
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़