रातरानी महकी चांदनी रात में

रातरानी महकी चांदनी रात में

 

रातरानी महकी चांदनी रात में,

जैसे कोई गुप्त कहानी बात में।

शीतल पवन ने धीरे से छू लिया,

मन खो गया उस मधुर सौगात में।

चांद ने ओढ़ी दूधिया चादर,

तारे सिमट गए उसकी बारात में।

खामोशी भी गुनगुनाने लगी,

सुर छिपे थे हर एक जज़्बात में।

सुगंध बही जैसे यादों की डोर,

बांध गई दिल को उस एक मुलाकात में।

नींद भी ठहर कर देखने लगी,

क्या जादू है इस हसीन हालात में।

रातरानी की हर एक खुशबू,

लिख रही थी प्रेम नई हर पात में।

चांदनी बोली धीमे स्वर में,

“जीवन बसता है इन जज़्बात में।”

 

स्वरचित/मौलिक

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़