लोक संस्कृति का महाकुंभ, अवधी-भोजपुरी ‘लोक रंग’ उत्सव का भव्य समापन
गौरा गाँव में बिखरे माटी के सुर, युवा पीढ़ी को विरासत से जोड़ने की अनूठी पहल
बस्ती: जनपद का गौरा गाँव सोमवार को एक मिनी भारत के रूप में जीवंत हो उठा। अवसर था युवा विकास समिति द्वारा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित ‘अवधी-भोजपुरी लोक रंग उत्सव’ का। कलाकारों नें मंचीय प्रस्तुति कार्यक्रम द्वारा न केवल लोक विधाओं की चमक बिखेरी, बल्कि आधुनिकता की चकाचौंध में लुप्त हो रही अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश भी दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि नितेश शर्मा द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि “लोक कलाओं का संरक्षण हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है, इन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।”मंच पर जब कलाकारों ने सोहर, नकटा और पारंपरिक विवाह गीतों की तान छेड़ी, तो पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कलाकारों के अभिनय और गायन में उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र की शालीनता और बिहार के भोजपुरी अंचल की ऊर्जा का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिला। इस मौके पर विवेक पाण्डेय और दिव्या मौर्या की जुगलबंदी ने अवधी लोक विधाओं को जीवंत कर दिया। डॉ. प्रतिमा यादव व महक श्रीवास्तव: पारम्परिक ‘संस्कार गीतों’ के माध्यम से भारतीय संस्कारों की महत्ता बताई। सालिकराम व संतोष कुमार: ग्रामीण वाद्य यंत्रों की थाप पर दर्शकों को थिरकने पर मजबूर किया।
समारोह के दौरान आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने लोक कलाओं के गिरते स्तर और उनके संरक्षण पर गंभीर चिंतन किया। अम्बिका प्रसाद मिश्र ने कहा, “हमारी लोक संस्कृति ही हमारी मौलिक पहचान है, इसे बचाना हमारा धर्म है।” डॉ. राम ललन मिश्र और डॉ. नवीन सिंह ने जोर दिया कि परंपराएं केवल अतीत की यादें नहीं, बल्कि भविष्य की नींव हैं। सौरभ और पुनीत मिश्र ने इसे समाज को जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम बताया, जबकि प्रतीक और राम मूर्ति मिश्र ने सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
आयोजक संस्था युवा विकास समिति के सचिव बृहस्पति कुमार पाण्डेय ने कहा “आज की पीढ़ी डिजिटल युग में अपनी जड़ों से कट रही है। ऐसे आयोजन ही उन्हें यह याद दिलाएंगे कि हमारी असली ताकत हमारे गाँवों और हमारी लोक धुनों में छिपी है।”
उत्सव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वह कार्यशाला रही, जहाँ अनुभवी गुरुओं ने युवा प्रतिभागियों को लोक गायन और वादन की बारीकियां सिखाईं। गायन में उतार-चढ़ाव, सुरों का तालमेल और मंच पर प्रस्तुतीकरण के तरीकों पर विस्तार से चर्चा की गई। आयोजकों का मानना है कि इस प्रशिक्षण से ग्रामीण क्षेत्रों की छिपी हुई प्रतिभाओं को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों के लिए तैयार किया जा सकेगा।
देर शाम तक चले इस सांस्कृतिक महाकुंभ में सैकड़ोंकी संख्या में ग्रामीण और कला प्रेमी मौजूद रहे। कार्यक्रम ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि सही मंच मिले, तो लोक कलाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रभावशाली हैं जितनी सदियों पहले थीं।