काव्य: “माँ स्कंदमाता की स्तुति”
पंचमी का पावन प्रभात, ज्योति अलौकिक छाई,
माँ स्कंदमाता आईं, करुणा की गंगा लाई।
श्वेत कमल पर विराजी, शीतलता की छाया,
ममता की मूरत बनकर, जग को स्नेह सिखाया।
गोद में स्कंद सुशोभित, शक्ति का संगम प्यारा,
माँ के आँचल तले ही, वीर बना उजियारा।
चार भुजाओं में दमके, आशीषों का उजाला,
हर संकट मिट जाए, जो ले नाम निराला।
सिंह सवारी करतीं, निर्भयता का संदेश,
भय का नाम मिटे जहाँ, बसता माँ का वेश।
भक्तों के हर दुःख को, पल में दूर भगाती,
अंधकार के बीचों-बीच, दीपक बन जगमगाती।
ममता और शक्ति का अद्भुत ये संगम है,
हर दिल में बसती माता, हर श्वास में सरगम है।
जो सच्चे मन से पुकारे, माँ दौड़ी चली आती,
सूनी राहों में भी वो, खुशियों के फूल खिलाती।
स्कंदमाता की महिमा, शब्दों में ना समाए,
जिसने भी ध्यान लगाया, जीवन सफल हो जाए।
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़