ज़मीरों को जगाने में बहुत ही देर लगती है

ज़मीरों को जगाने में बहुत ही देर लगती है
ज़मीरों को सुलाने में बहुत ही देर लगती है

अदावत, नफ़रतें, कब गुफ्तगू से ख़त्म होती हैं
समुन्दर को सुखाने में बहुत ही देर लगती है

परिंदे इस क़दर पिंजरों के आदी हो गए इनको
परों को आज़माने में बहुत ही देर लगती है

दरो-दीवार और छत से मकां तो बन गये लेकिन
मकां को घर बनाने में बहुत ही देर लगती है

बहुत आसान है पल-भर में बस्ती को जला देना
मगर इक घर बसाने में बहुत ही देर लगती है

वफ़ा की राह में खाया हो जिसने बारहा धोका
उसे अपना बनाने में बहुत ही देर लगती है

ज़माने में बहुत है आम नज़रों को चुरा लेना
किसी का दिल चुराने में बहुत ही देर लगती है

किसी कागज़ पे कुछ लिक्खें बहुत मुमकिन है मिट जाये
लिखा दिल पर मिटाने में बहुत ही देर लगती है

अगर किस्सा कोई होता भुला देते कभी का हम
मुहब्बत को भुलाने में बहुत ही देर लगती है

बिठाकर सामने उनको सुना तो दें ग़ज़ल लेकिन
“किरण” धड़कन सुनाने में बहुत ही देर लगती है

©डॉ कविता”किरण” (ग़ज़ल संग्रह “उफ़” से)