होली में छिपा है प्राकृतिक रहस्य

होली में छिपा है प्राकृतिक रहस्य

प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने बताया – ऋतु परिवर्तन, स्वास्थ्य और पर्यावरण संतुलन का वैज्ञानिक आधार

बस्ती। होली पर्व के अवसर पर प्रो. डॉ. नवीन सिंह, राष्ट्रीय महासचिव, विश्व संवाद परिषद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ, भारत ने कहा कि होली केवल रंगों और उत्साह का त्योहार नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्रकृति और स्वास्थ्य का गहरा वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। यह पर्व ऋतु परिवर्तन के महत्वपूर्ण चरण में मनाया जाता है, जब शीत ऋतु समाप्त होकर वसंत का आगमन होता है।

उन्होंने बताया कि आयुर्वेद के अनुसार शीत ऋतु में शरीर में कफ का संचय होता है, जो वसंत में पिघलने लगता है। इस कारण सर्दी-जुकाम और एलर्जी जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में होलिका दहन की अग्नि के पास बैठना वातावरण की शुद्धि और ऊष्मा प्रदान करता है, जिससे संक्रमण की संभावना कम होती है। यह परंपरा सामूहिक स्वास्थ्य संरक्षण का प्रतीक रही है।

प्रो. डॉ. सिंह ने कहा कि प्राचीन काल में होली के रंग प्राकृतिक और औषधीय तत्वों से बनाए जाते थे। टेसू (पलाश) के फूल, हल्दी, चंदन और गुलाब से तैयार रंग त्वचा के लिए लाभकारी होते थे। हल्दी में जीवाणुरोधी गुण हैं, जबकि चंदन शीतलता प्रदान करता है। इस प्रकार होली का पर्व प्रकृति और स्वास्थ्य के संतुलन का संदेश देता है।

उन्होंने सामाजिक दृष्टि से भी होली के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व आपसी भेदभाव मिटाकर प्रेम और समरसता बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। सामूहिक उत्सव और आनंद मानसिक तनाव को कम करते हैं तथा सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ बनाते हैं।

अंत में प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने देशवासियों से आह्वान किया कि होली को प्राकृतिक और पर्यावरण-सुरक्षित तरीके से मनाएँ। रासायनिक रंगों से बचते हुए पारंपरिक, हर्बल रंगों का उपयोग करें और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करें। उन्होंने सभी को स्वास्थ्य, सौहार्द और नवजीवन की शुभकामनाएँ दीं।