25 वें वैवाहिक वर्षगांठ का अनमोल उपहार

संस्मरण

25 वें वैवाहिक वर्षगांठ का अनमोल उपहार

 

 

15 फरवरी ‘2026 को मेरी 25 वीं वैवाहिक वर्षगाँठ पर बेटियों ने सत्य नारायण भगवान की कथा का आयोजन किया। जिसमें गुरु रुपरिवार के अलावा कुछ पारिवारिक लोगों को आमंत्रित किया गया था। यह और बात थी पारिवारिक सदस्यों में कोई उपस्थित नहीं हुआ। फिर छोटा सा आयोजन कब बड़ा हो गया कि पता ही न चला। हर किसी को कथा और शाम के भोजन हेतु ही आमंत्रित किया गया था, न कि वैवाहिक वर्षगाँठ के आयोजन हेतु। बाद में कुछ लोगों ने इसकी शिकायत भी की। क्योंकि कुछ लोगों को सोशल मीडिया से इसकी जानकारी हो भी गई थी।50-60 लोगों की योजना 120-130 तक पहुँच गई। जिसकी कोई जानकारी मुझे भी नहीं हुई। वैसे भी सादा जीवन -उच्च विचार की मेरी शैली है। जन्मदिन हो या वैवाहिक वर्षगाँठ। बिना किसी तामझाम के मंदिर में माथा टेका, प्रसाद चढ़ाया, जो कुछ खाना पीना है। घर में सबके साथ खाया पिया, बस हो गया, इससे अधिक में मेरा यकीन कभी नहीं रहा।लेकिन इस बार मेरी सोच बच्चों के आगे धराशाई हो गई। दोनों बेटियां भी घर आ गईं। फिर तो आप समझ ही सकते हैं कि बच्चों की खुशी के आगे सब व्यर्थ है। खैर….।

अवसर विशेष और बच्चों की खुशी का अहसास तो हो ही रहा था, लेकिन यह अवसर मेरे लिए तब अतिविशेष बन गया जब मुँहबोली बहन अचानक बिना किसी सूचना के आ गई, वह इतना खुश थी कि सामने पड़ते ही वह लिपटकर रो पड़ी, मेरी आँखें भी नम हो गईं, क्योंकि उसके आने का तो मुझे उम्मीद भी नहीं था, यह और बात है कि मन में यह भाव जरुर था कि काश वो भी आज हम सबके बीच उपस्थित होती। शायद ईश्वर ने मेरी भावनाओं को गंभीरता से लिया और उसे प्रेरित किया। तभी तो वह अचानक से निर्णय कर चली होगी।सच कहूँ तो मेरे लिए विश्वास करना इसलिए भी कठिन हो रहा था, क्योंकि दोपहर में उसने आभासी बातचीत में आने की इच्छा होते हुए भी न आ पाने की अपनी विवशता भी बताई थी, जिसे मैं समझ भी रहा था। आश्चर्य इसलिए भी कि वह इसके पूर्व एक बार महज घंटे -डेढ़ घंटे के लिए जनवरी २०२५ अपनी दीदी और सहेली के साथ अचानक ही आई थी।

हालांकि पूजा के समय उसका फोन भी आया था, बेटी से बात भी हुई। लेकिन उसने बेटी को मुझे कुछ भी बताने से मना भी कर दिया था। बुआ की भतीजी ने बुआ की बात को महत्व दिया और मुझे कानों-कान खबर नहीं होने दी।

उसका आगमन मेरे लिए सबसे अनमोल उपहार की तरह रहा। लगभग दो-ढाई घंटे ही वह रही, लेकिन उसकी खुशी देखकर उपस्थित लोगों को आश्चर्य हो रहा था कि आखिर ये कौन है? जो इतना उत्साहित है, जैसे अपनी सगी बहन हो। कोई झिझक नहीं, कोई अंजानापन नहीं। बस हँसती, खिलखिलाती हुई, इतने कम समय में भी वह बच्ची हर किसी पर अपनी छाप छोड़ गई। उसका आना ही मेरे लिए अनमोल था। जब भी वह मुझसे मिली एकदम छोटी बच्ची जैसी लगी। छोटी बहन की तरह पूरे अधिकार से मिली। कहने को वह भले ही मुँहबोली बहन है। पर मेरे लिए वह बेटी जैसी ही है। और तो और मुझे उसमें अपनी माँ की छवि साफ दिखती है। भले ही वह मुझसे बहुत छोटी है, पर उसके पैर छूना मुझे आत्मिक सूकून देता है। उसका हाथ अपने शीश पर पाकर खुद को सौभाग्यशाली महसूस करता हूँ।वैसे भी अक्सर उसके हाव भाव में अपने लिए माँ को महसूस करता हूँ। हो सकता है कि आप विश्वास करें न करें, कि उसके लाड़ प्यार दुलार अधिकार में कोई कमी नहीं है। छोटी बहन/बेटी की तरह बड़े भाई के रुप में मुझे पूरा सम्मान भी देती है, फिर भी मुझे उससे डर भी बहुत लगता है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि जब से हम आत्मीयता के इस बंधन में बंधे हैं, हमेशा यह महसूस हुआ कि वह मेरी जीवन रेखा लंबी करने में जुटी है। कारण कि पिछले पाँच सालों से अपनी शारीरिक परिस्थितियों को देखते हुए जाने क्यों बहुत बार मुझे खुद से ही डर लगता है।

अब इसे ईश्वर की व्यवस्था कहें या और कुछ, पर मेरे लिए तो वह अनमोल ही है, पिछले महज कुछ सालों

में ही उसने मुझे जीने का हौसला दिया, जिम्मेदारियों को महसूस कराया, एक बहन बेटी की तरह अपने कर्तव्य और अधिकारों प्रति जागरूक रहकर उसने आज के विशेष अवसर पर अपनी उपस्थिति मात्र से मेरे जीवन की चंद सर्वाधिक खुशियों में एक नया पन्ना जोड़ गई।

ईश्वर उसे हमेशा स्वस्थ, सानंद रखे। उसके लिए मेरा स्नेह, आशीर्वाद और अधिकार हमेशा सुरक्षित था, है और मेरे जीवन की आखिरी साँस तक रहेगा।