विषय: मेरी आवाज़ ही मेरी पहचान है
मुक्तक:
अयोध्या की गलियों में अब, वीणा की झंकार है,
स्वर-सम्राज्ञी के चरणों में, श्रद्धा का उपहार है।
नया घाट अब ‘लता चौक’ बन, जग को राह दिखाता है,
युगों-युगों तक गूँजेगा जो, वो सुरमई आधार है।
कविता:
“लग जा गले” की वो कशिश, हर दिल को पास लाती है,
“अजीब दास्तां” बनकर, जो यादें ताज़ा करती है।
युवाओं के धड़कन में आज भी, थिरकती उनकी धुन है,
हर जुबां पर बस “तुझे देखा तो”, प्रेम का ही शगुन है।
“ऐ मालिक तेरे बंदे हम”, बन स्कूलों की शान गई,
“इतनी शक्ति हमें देना”, बच्चों की बन पहचान गई।
सरयू के पावन तट पर अब, उनका ही नाम पुकारें हम,
“दया कर दान भक्ति का”, गाकर आरती उतारें हम।
चौक पे मिलने के वादे अब, उनकी याद दिलाएंगे,
मिश्री से मीठे स्वर उनके, पीढ़ियों को महकाएंगे।
कंठ अमर, व्यक्तित्व अमर, वो संगीत का सुहाग है,
“मेरी आवाज़ ही पहचान है”, हर हृदय का राग है।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)