विषय-“हिंदी: हमारी संस्कृति का स्वाद”
कल रात हिंदी मेरे सपनों में आई थी, उसके मुख पर मंद मुस्कान और बड़ी खुशी छाई थी।
मैंने पूछा— “हिंदी, तुम इतनी खुश हो कैसे?
” बोली— “अब मिलता है सम्मान मुझे सबसे।”
बच्चा जब पहली बार बोले ‘माँ’, वह छंद भी तो हिंदी है,
जब कहे प्यार से ‘बाबूजी’, वह शब्द भी तो हिंदी है।
नानाजी की लाठी और नानी का चश्मा भी हिंदी है,
जिस भूमि राम ने जन्म लिया, वह पावन धरती हिंदी है।
हमारा व्यंजन बिहारी, लिट्टी-चोखा भी तो हिंदी है,
रसीली और मीठी, बालूशाही भी तो हिंदी है।
मकर संक्रांति का दही-चूड़ा, वह भी तो हिंदी है,
शनिवार की वो खिचड़ी, वह भी तो हिंदी है।
होली के वो मीठे पूए, वह भी तो हिंदी है, सावन के घेवर की मिठास, वह भी तो हिंदी है।
बने विश्व की भाषा हिंदी, हम सबकी अभिलाषा है,
प्रेम, एकता और अपनेपन की, यही तो परिभाषा है।
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)
मेरी स्वरचित रचना