दो माओं का बेटा (भगत सिंह) – ज्योती वर्णवाल 

शीर्षक- दो माओं का बेटा (भगत सिंह)

काली स्लेट पर नाम लिखता, वो मां का राजदुलारा था,

नन्ही आंखों में बसता, भारत का एक सितारा था।

कहता था— “मां, तेरे लिए एक प्यारी बहू लाऊंगा,

तेरे इन थके हुए हाथों का, मैं बोझ घटाऊंगा।”

पर नियति ने विरह की एक अलग ही पटकथा लिखी थी:

वो खेल-खेल की बातें, मां! वो सचमुच कर गया,

“दुल्हन मेरी आज़ादी है,” कह फंदे पर चढ़ गया।

चूम कर माथा मां का, वो वचन दे गया भारी,

“अगले जन्म में रहूंगा मां, बस सेवा में तुम्हारी।”

“मत आना लेने लाश मेरी,” जब वीर ने मां से कहा होगा,

सोचो उस ममता के दिल पर, क्या-क्या न सहा होगा?

“तुझे रोते देख कहेंगे लोग— देखो भगत की मां रोती है,”

शहादत की उस घड़ी में, मां की ममता कहां सोती है?

जेलर ने जब आवाज़ दी, समय हुआ अब जाने का,

रुका नहीं वो दीवाना, धुन में आज़ादी पाने का।

“रुको जरा! एक क्रांतिकारी, दूसरे से मिल रहा है,”

किताब के आखिरी पन्नों में, इंकलाब खिल रहा है।

हंसते-हंसते चूम ली फांसी, जैसे मां का आंचल हो,

मिट गया वो देह से, पर बन गया वो विचारधारा का बादल हो।

राजगुरु, सुखदेव संग, वो अमर कहानी लिख गया,

ज़िंदा है वो आज भी, जो मौत को भी जीत गया।

जेल का कोना-कोना आज भी ‘रंग दे बसंती’ गाता है,

जब भी नाम आता है भगत का, हर सिर झुक जाता है।

 

ज्योती वर्णवाल

नवादा (बिहार)