मरे कोई जिये कोई, तुम्हें क्या फर्क़ पड़ता है

शबे-फुरक़त का हर लम्हा शरारे-सा दहकता है
तुम्हें मालूम क्या किस कैफ़ियत में दिन गुज़रता है

हमारी नींद ग़ायब है मगर तुम चैन से सोओ
मरे कोई जिये कोई, तुम्हें क्या फर्क़ पड़ता है

जुदा हम हो गये बेशक मगर सच है सनम अब भी
तुम्हारा नाम सुनते ही हमारा दिल धड़कता है

हमारा रेशमी रिश्ता अगरचे खूबसूरत है
इसे जितना भी सुलझाओ ये उतना ही उलझता है

तुम्हारे बिन “किरण” कैसे गुज़रते हैं हमारे दिन
ज़बां ये कह नहीं पाती मगर दिल सब समझता है

*©डॉ कविता”किरण”*