जिसमें शिफ़ा हो रख्खी मुझे वो दवा न दो,
लंबी हो ज़िंदगी मेरी ऐसी दुआ न दो।
दिल में जगह न दो मुझे मंज़ूर है मगर,
नज़रों से अपनी मुझको तुम इतना गिरा न दो।
जल जाए मुल्क सारा ताअस्सूब की आग में,
सरदार बुझते शोलों को इतनी हवा न दो।
क़ब्रें यहीं बनेंगी यही दफ़्न होंगे हम,
इस बात को हमारी हवा में उड़ा न दो।
इतनी भी गहरी खायी न खोदो हमारे बीच,
जिसको कि पाटने में सभी कुछ गवां न दो।
कुछ तो वक़ार रख्खो अदलिया का मुल्क में,
अब नाम देख देख के मुंसिफ सज़ा न दो।
उस दहरिये को छोड़ दो अब उसके हाल पर,
बदबख़्त को नदीम कोई बद्दुआ न दो।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥