तनिक लाठी तो लाना – ज्योति कुमारी

#विद्या-छंदमुक्त काव्य

 

शीर्षक: तनिक लाठी तो लाना…

 

वह नन्हा सा राजकुंवर,

जब खींचता है कुर्ता मेरा,

कहता है— “दादा जी, बस सोए ही रहते हो,

चलो ना, मेरे साथ खेलने।”

मैं मुस्कुराता हूँ,

अपनी थकी हड्डियों में फिर से जान पाता हूँ,

उसे कहता हूँ— “नहीं-नहीं मेरे लाल,

तनिक मेरी लाठी तो लाना, मैं अभी आता हूँ।”

उस छोटे से हाथ ने,

जब मेरी कांपती उंगलियों को थामा,

सड़क की उस ढलान पर,

मैंने समय को पीछे मुड़ते देखा।

हम चल दिए—

एक नया खेल खेलने,

अपने बचपन के किस्से सुनाते,

पतंग की डोर संग, जीवन के शिष्टाचार सिखाते।

वह पतंग की ऊँची उड़ान,

उसे आसमान नापना सिखाती है,

और मेरा हाथ पकड़कर चलना,

उसे जड़ों से जुड़ना सिखाती है।

मैं जी रहा हूँ अपना बचपन फिर से,

उसी मासूमियत और उसी उमंग से,

क्योंकि जानता हूँ—

बीता समय कभी लौटकर नहीं आता,

पर पोते की आँखों में, मैं अपना कल देख पाता हूँ।

“ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा”—

यह बात सच है शायद,

इसीलिए इस ‘समय दान’ से,

मैं अपनी एक नई पहचान बना रहा हूँ।

अब कोई अफसोस नहीं,

कि आधी उम्र ढल गई,

क्योंकि उसकी खिलखिलाहट में,

मेरी ज़िंदगी फिर से संवर गई।

 

ज्योती कुमारी

नवादा (बिहार)