कोई न जाने पीड़ पराई

कोई न जाने पीड़ पराई

विधा-कविता

अपने दर्द लगे बड़े सभी को,

दूजे का दर्द ना देखे कोई।

यही रीत संसार की भाया,

पीर पराई जाने ना कोई।।

 

सुने कोई ना दूजे की पीड़ा,

खुद का दुखड़ा रोता हर कोई।

अंसुअन नीर बहाए खुद को,

पर एहसास न दूजा किसी का कोई।।

 

लगे बड़ा हर दर्द हैं अपना,

दूजे का सब लगे हैं झूठा मजमा।

कौन बांटे यहां पीर किसकी पराई,

सब लिए बैठे हैं रोना अपने जीवन का।।

 

चिंगारी पीर की बड़ी ही गहरी,

जो समझे दूजे की वह ज्ञानी कहलाए।

रख दे पीर पर हाथ जो अपना,

ऐसा मीत काश सभी को मिल जाए।।

मधु गुप्ता अपराजिता