• कृष्ण जन्म उत्सव पर थिरके श्रद्धालु
कुदरहा, बस्ती। सुख-दुख मानव जीवन का प्रारब्ध है। मानव जीवन मे लाभ-हानि, मान-अपमान इसी के अनुरूप मिलता है। कर्म प्रधान है इसलिए हमे जीवन का हर क्षण अच्छे कार्यो मे लगाना चाहिए।
उक्त उदगार अयोध्या धाम से पधारे कथावाचक शिवमंगल वैदिक ने कुदरहा गांव में चल रही भागवत कथा में वक्त की। उन्होने कहा कि बिना सत्संग के विवेक की प्राप्ति नहीं हो सकती है। कलयुग में श्रीमद्भागवत पुराण की कथा सुनने मात्र से व्यक्ति भवसागर पार हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस पुराण के श्रवण से से प्राणी के अंदर सोया हुआ ज्ञान वैराग्य जागृत हो जाता है। श्रीमद्भागवत कल्पवृक्ष के समान है, जिससे सभी इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए संसार के हर मनुष्य को अपने जीवन से समय निकालकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिए।
कथा को आगे बड़ाते हुए भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन कर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की महत्ता पर प्रकाश डाला। अत्याचार को समाप्त करने और धर्म की स्थापना के लिए होता है। जेल में बंद वासुदेव व देवकी के आठवें पुत्र के रूप में भगवान कृष्ण के जन्म लेते ही पहरा दे रहे सिपाही सो गया और वासुदेव की बेड़ियां टूट जाती हैं। प्रभु को लेकर यमुना नदी पार करते समय भारी बरसात होने लगा। किसी तरह गोकुल पहुचे और वहां से यशोदा की पुत्री को लेकर फिर मथुरा की जेल में पहुच गये। राजा कंस योगमाया को मारने की कोशिश करने लगा लेकिन योगमाया उसके हाथ से छूट जाती है। वह कहती है कि कंस तुझे मारने वाला पैदा हो चुका है। कंस के अत्याचारों से कराहती प्रजा व धरती पर बढ़ते हुए पापों के कारण भगवान श्री हरि को द्वापर में भगवान कृष्ण के रूप में अवतरित होना पड़ा। प्रभु ने अपनी बाल लीलाओं के दौरान अत्याचारियों व राक्षसों का बध करके प्रजा की रक्षा किये।
कथा में मुख्य यजमान कौशलेंद्र मणिओझा, ररकेंद्र मणि लल्लू ओझा, उत्तम, शकुंतला, डा शिवेंद्र ओझा, डा सतेंद्र मणि ओझा, महेश कुमार, गौरव, गनीष, अभिनव, उत्सव, अर्थव, भोला तिवारी, गजन सहित त तमाम लोग मौजूद रहे।