ख्वाहिशें दिल में दफ्न रहती हैं, खेल ग़ुर्बत के भी निराले हैं, साहिल प्रतापगढ़ी

ख्वाहिशें दिल में दफ्न रहती हैं, खेल ग़ुर्बत के भी निराले हैं, साहिल प्रतापगढ़ी,,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 4 नवंबर

सलीम बस्तवी अज़ीज़ी

मुम्बई संवाददाता ।

जिस तरह उत्तर प्रदेश में साहित्य और अदब की ज़मीं आबाद है उसी तरह मुंबई जैसी आर्थिक नगरी में भी साहित्य और अदब की धारा हमेशा बहती रहती है और उस धारा में हमेशा कुछ नए और पुराने शोअरा अपनी मौजूदगी का ऐहसास कराते रहते हैं । उन्हीं शोअरा में एक नाम आता है साहिल प्रतापगढ़ी का जो पिछले 4 वर्षों से मुंबई जैसी आर्थिक नगरी में अपनी शायरी से लोगों को बाग बाग कर रहे हैं। मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी आज उनकी एक खास ग़ज़ल से आपको रूबरू करा रहा हूं ,

१- ज़िन्दगी के भी अब तो लाले हैं,

रोग उल्फत के हमनें पाले हैं ।

२- उनका है क्या कसूर खुद हमने,

रास्ते दर्द के निकाले हैं ।

३- कोई समझे थकान न मेरी,

ग़मगुसारी को सिर्फ छाले हैं ।

४- ख्वाहिशें दिल में दफ्न रहतीं हैं,

खेल गुरबत के भी निराले हैं ।

५- मेरे सज्दे हैं उस खुदाई को,

सारे आलम को जो संभाले हैं ।

६- कोई आयेगा गार में कैसे,

मकड़ियों के ही कुल ये जाले हैं ।

७- ये फरिश्तों के काफिले हैं क्या,

लोग कितने ये भोले भाले हैं ?

८- मुफ्लिसों की जलायें जो बस्ती,

कुर्सियाॅं उनके ही हवाले हैं ।

९- आइना भी खुशी से इतराये,

रूबरू फिर वो आने वाले हैं ।

१०- मुझको इज़्ज़त अज़ीज़ है *साहिल* ,

आप पगड़ी मेरी उछाले हैं ।