देश आज 31 अक्तूबर को भारत के लौह पुरुष एवं महान स्वतंत्रता सेनानी सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयंती हर्षोउल्लास के साथ मना रहा हैं । यह पर्व इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इसी दिन भारतीय धरा पर राजनीति, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, धर्म, दर्शन आदि अनेकों क्षेत्रों में पारंगत सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म गुजरात के एक छोटे से गाँव नाड़ियाद में, एक कृषक परिवार में 31 अक्तूबर 1875 को हुआ था। सरदार पटेल की माता लाड़वा देवी गृहिणी तथा पिता झवेरभाई पटेल एक कृषक एवं महारानी लक्ष्मीबाई की सेना में कार्यरत थे ।ग्रामीण परिवेश में जीवनयापन करने के कारण उनकी संवेदना ग्रामीण समस्याओं एवं लोगों के प्रति सर्वाधिक थी। 1913 में लंदन के वापसी के पश्चात वे ग्रामीण जनता से घनिष्ट संबंध बनाकर एक नेतृत्वकर्ता के रूप में उनके समस्याओं के समाधान एवं उनके संपूर्णमूलक कल्याण में कार्यशील हो गए । 1917 में प्रथम बार महात्मा गांधी से मुलाकात के पश्चात न केवल उनकी राजनीतिक प्रबुद्धि में विस्तार हुआ बल्कि गांधी के नैतिक मूल्यों से प्रभावित होकर वे उनके एक प्रमुख अनुयाई बन गए। देश की बिखरी रियासत के एकीकरण के साथ- साथ विभिन्न ग्रामीण आंदोलनों में मुख्य भूमिका में कार्य करके सरदार पटेल ने ग्रामीण समाज की संरचना एवं कृषि समस्याओं के निराकरण में अनेकों सुधारों को जन्म दिया। सरदार पटेल विकेंद्रीयकरण विकास के नीतियों से प्रभावित थे तथा ग्रामीण समाज के विकास पर विशेष बल दिया क्योंकि उनका मानना था कि भारत का वास्तविक विकास मात्र ग्रामीण एवं कृषि विकास को विकसित करके किया जा सकता हैं । स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उन्होंने कृषि उत्पादकता, संसाधनों की उपलब्धता, भूमि सुधार एवं ऋण सामजस्य पर विशेष बल दिया । अपने एक सम्बोधन में उन्होंने कहाँ था “यदि कोई इस धरती पर अपना सिर ऊंचा करके चलने योग्य है, तो वह किसान है, वह उत्पादक है, बाकी परजीवी हैं लेकिन उसकी कितनी दयनीय स्थिति हो गई है” सरदार पटेल द्वारा संबोधित प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से उनकी किसानों के प्रति झुकाव एवं गहरी असंतुष्टि को समझा जा सकता हैं। आत्मनिर्भरता एवं विकेंद्रीयकरण की अवधारणा के माध्यम से सरदार पटेल कृषि व्यवस्था के मात्र प्रशासनिक सुधार पर केंद्रित न होकर वे कृषि समुदाय के सम्पूर्ण आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक आयामों पर केंद्रित थे जिसके माध्यम से किसानों को उनके श्रम का उचित मूल्य प्रदान करना सुनिश्चित करने के साथ-साथ उन्हे बाहरी कारकों के निर्भरता से मुक्त करके सशक्त एवं विकसित करना था । ऋण ग्रस्त एवं ब्रिटिश सरकार तथा बिचौलियों के अत्याचारों से प्रभावित किसानों के निराकरण में पटेल की भूमिका अत्यंत प्रभावी हैं जिसके माध्यम से किसान मध्यस्थों के शोषण से मुक्त होकर आत्मनिर्भर होकर अपने फसलों के उत्पादन एवं बिक्री में सफल हो पाएं। 1918 में उनके द्वारा खेड़ा आंदोलन में एक प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में किसानों की शक्ति एवं विरोध को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया जिसके फलस्वरूप एक बड़ी सफलता के रूप में ब्रिटिश सरकार ने एक वर्ष के लिए समस्त करो के भुगतान को निलंबित करने का फैसला लिया गया एवं कर की दर को भी कम किया । इसी प्रकार 1928 में व्यापक रूप से क्रियान्वयित बारदौली आंदोलन के माध्यम पटेल को किसानों की मांग एवं विरोध का एक नवीन अवसर प्राप्त हुआ जिसकी प्रासंगिकता वर्तमान किसान आंदोलनों के आधार रूपी स्तर के रूप में देखी जा सकती हैं । ब्रिटिश सरकार के बढ़ते अत्याचार, शोषण एवं असमान व्यवहार एवं तत्कालीन शासन के 30% कृषि राजस्व कर में बढ़ोत्तरी करने के निर्णय ने किसानों ने एक संगठित विरोध का निर्णय लिया और सरदार पटेल से नेतृत्व की मांग की। आंदोलन की बढ़ती प्रसिद्धता के कारण अंग्रेज सरकार मैक्सवेल-ब्रूमफील्ड आयोग नियुक्त किया जिसका कार्य आंदोलन के कारणों की जांच करना था । अपनी रिपोर्ट के माध्यम से आयोग ने कर वृद्धि को अनुचित एवं अव्यवस्थित बताकर सरकार के द्वारा किए गए कर वृद्धि को कम करने का निर्देश दिया । इस आंदोलन के सफल होने के पश्चात ग्रामीण महिलाओं ने वल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि से विभूषित किया जो उनके नेतृत्व के उचित निर्देशन का प्रतीक हैं । ।1946 में सरदार पटेल के नीतियों से प्रेरित जिला सहकारी दुग्ध उत्पादन संगठन जो बाद में अमूल मिल्क यूनियन लिमिटेड के नाम से प्रचलित हुआ की स्थापना पटेल के सहकारिता आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध एवं सफल उदाहरण में से एक हैं। 21वीं सदीं में भारतीय कृषि एवं किसान नवीन कृषि पद्धतियों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के बदलते प्रतिरूप, अप्रत्याशित वर्षा, लघु एवं सीमांत किसानों की संसाधनों पर अपर्याप्त पहुँच, निम्न आर्थिक स्थिति एवं अन्य सामाजिक एवं आर्थिक कारणों से संलिप्त किसान विभिन्न समस्याओं एवं संकटों से जूझ रहे हैं । इन संकटों के परिणामस्वरूप कृषि क्षेत्र में विकास की अनेकों बाधाएं सामने आ रही हैं जिनमें किसानों का कृषि से मोहभंग, शहरी प्रवासन, कृषक आत्महत्या, बढ़ती घरेलू ऋणग्रस्तता आदि प्रमुख हैं ।इन प्रमुख योजनाओं के माध्यम से यह पता चलता हैं कि मात्र सब्सिडी, पारंपरिक पद्धति एवं प्रणाली के माध्यम से वर्तमान कृषक समाज के बहुमुखी समस्याओं का निवारण अत्यंत कठिन हैं । इसके लिए संरचनात्मक भूमि विखंडन, असंतुलित बाजार नियंत्रण, सहकारी संरचनाओं में सुधार आदि अत्यंत आवश्यक हैं इन सभी सुधारों में सरकार पटेल की अवधारणा की प्रासंगिकता की झलक दिखाई देती हैं जो वर्तमान समय में भी उपशामक उपायों के रूप में प्रभावी हैं ।वर्तमान समय में कृषि बीजों, उर्वरकों एवं फसल मूल्यों के खरीद एवं बिक्री में बिचौलियों की भूमिका अत्यंत सक्रिय एवं शोषणकारी हैं जिसके कारण किसानों को ना ही फसलों का उचित मूल्य प्राप्त होता हैं एवं बीजों एवं उर्वरकों को अधिक मूल्य पर खरीदना पड़ता हैं। इन समस्याओं के निराकरण हेतु सरकार को सहकारी संस्थाओं की भूमिका को अधिक प्रासंगिक एवं प्रभावी बनाने के साथ-साथ कृषि नीतियों एवं योजनाओं को प्रभावी बनाने हेतु धरातलीय स्तर जागरूक करने की मुहीम चलानी चाहिए जिससे ये नीतियाँ मात्र कागजों पर ही सफल न होकर कृषि समाज को विकसित एवं प्रभावी करने में सक्षम जो पाएं एवं उन्हे संकटों से मुक्त करके मुख्यधारा में सम्मिलित कर पाएं।