
बेटी जब ससुराल जाती है, पराई नहीं लगती,
मगर मायके में कुछ बातें, उसे पराई बनाती हैं।
हाथ मुंह धोने के बाद, टाविल का न इस्तेमाल,
बैग से रुमाल निकाल, मुंह पौंछती है, पराई लगती है।
रसोई के दरवाजे पर, अपरिचित सी खड़ी हो जाती,
पानी के गिलास के लिए, आँखें घुमाती, पराई लगती है।
वाशिंग मशीन चलाऊँ क्या, पूछती है, पराई लगती,
टेबल पर खाना लगने के बाद, बर्तन नहीं खोलती, पराई लगती है।
पैसे गिनते समय, नजरें चुराती है, पराई लगती,
बात बात पर ठहाके लगाकर, खुश होने का नाटक करती, पराई लगती है।
लौटते समय जवाब देती, ‘देखो कब आना होता है’,
तब हमेशा के लिए पराई हो गई, ऐसे लगती है।
लेकिन गाड़ी में बैठने के बाद, आंसू छुपाती है,
वह परायापन एक झटके में बह जाता, तब वो पराई नहीं लगती।
भइया मेरा मायका सजाए रखना, कुछ ना देना मुझको,
बस प्यार बनाए रखना, पापा के इस घर में मेरी याद बसाए रखना।
बच्चों के मन में मेरा मान बनाए रखना,
बेटी हूँ सदा इस घर की, ये सम्मान सजाये रखना।
बेटी से माँ का सफ़र, बेफिक्री से फिकर का सफ़र,
रोने से चुप कराने का सफ़र, उत्सुकत्ता से संयम का सफ़र।
पहले जो आँचल में छुप जाया करती थी,
आज किसी को आँचल में छुपा लेती हैं।
पहले जो ऊँगली पे गरम लगने से घर को सर पे उठाया करती थी,
आज हाथ जल जाने पर भी खाना बनाया करती हैं।
पहले जो छोटी छोटी बातों पे रो जाया करती थी,
आज वो बड़ी बड़ी बातों को मन में छुपाया करती हैं।
बेटी है तो कल है, बहुत प्यारी होती है बेटियाँ,
न जाने लोग बोझ क्यों समझते हैं बेटियाँ।
स्वरचित
मुकेश कविवर केशव सुरेश रूनवाल