बुद्ध की प्रासंगिकता

बुद्ध की प्रासंगिकता
बुद्ध के वास्तविक जीवन की शुरुआत उनके उन्तीस वर्ष के बाद घर छोड़ने से होती है।‌ घर छोड़ते ही उनके जीवन के पहले चरण की समाप्ति हो जाती है। उन्तीस से पैंतीस वर्ष की उम्र के बीच गौतम संन्यासी की तरह भटकते हुए इस बात की तलाश करते रहे कि मनुष्य की पीड़ा का अंत किया जा सके। जीवन के तीसरे चरण पैंतीस से अस्सी वर्ष की आयु तक गौतम लोगों को शिक्षा देते रहे । लगभग 45 वर्ष तक के उन वास्तविक जीवन में उन्होंने जो कार्य किये उसकी जरूरत आज भी हम सभी महसूस करते हैं।
आज के युग में जिस तार्किकता तथा ज्ञान विज्ञान की बातें हम करते हैं उसकी परंपरा बुद्ध ने बहुत पहले ही स्थापित कर दिया था। उनका मत था कि केवल सुनी सुनाई बातों पर मत जाओ, न ही उस आधार पर चलो जो औरों ने कहा है। पारंपरिक शिक्षा के आधिकारिक सिद्धांतों का भी अंधानुकरण मत करो। जो बातें परंपरा के आधार पर पीढ़ियों से चली आ रही है उसका पालन केवल इसलिए न करो कि हमारे बाप-दादों ने ऐसा किया बल्कि उस पर युगीन परिस्थितियों के अनुसार विचार करों, उसके सकारात्मक तथा नकारात्मक पहलू को अच्छी तरह परख लो तभी उसको अपने जीवन में लागू करो‌। बुद्ध चाहते थे कि लोग अपने विवेक तथा आंतरिक प्रकाश के आधार पर अनुभव का इस्तेमाल करते हुए किसी दर्शन पर अमल करें। वे आजकल धर्म गुरुओं से इस आधार पर अलग थे क्योंकि अंतिम फैसला में प्रश्नकर्ता पर ही छोड़ देते थे। उनका मानना था कि जीवन जो प्रश्न उठाता है उनका उत्तर तुम्हारे अंदर होता है। बाहर से किसी विचारधारा या अपने जीवन दर्शन को दूसरे पर थोपनें के वे कदापि पक्षपाती नहीं थे। एक तरह से उन्होंने वैयक्तिक दर्शन देने का प्रयास किया है।यह दर्शन व्यक्ति को अपने फैसले के आधार पर सोचने और जीने की राह दिखाता हैं।
वर्तमान दौर में धर्म का इस कदर व्यावसायीकरण हो गया है कि आजकल के धर्मगुरु तो स्वर्ग तक पहुंचाने का ठेका भी लेने लगे हैं। बस आप उनकी मांग पर खरा उतरें। पर बुद्ध आजकल के धर्म गुरुओं की तरह स्वर्ग की गारंटी नहीं लेते हैं। वे इस बात का भी आश्वासन नहीं देते हैं कि हर कोई अपने लक्ष्य पर पहुंच ही जाएगा। लक्ष्य पर पहुंचने के लिए सिर्फ अनुयायी होना ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए निरंतर प्रयास तथा सक्रिय भागीदारी की भी आवश्यकता होती है। इसी बात को लेकर एक बार बुद्ध के शिष्य मोग्गल्लान ने उनसे प्रश्न पूछा कि क्या बुद्ध के सभी अनुयायी संसार की दुखों से निश्चित रूप से मुक्त हो जाएंगे? बुद्ध ने पुरोहित जाति के मोग्गलान को जवाब दिया कि क्या तुम राजगृह का रास्ता जानते हो? मोग्गलान ने उत्तर दिया हां, तो तुम फिर किसी को वह रास्ता बता सकते हो, मोग्गलान ने कहा कि बिल्कुल यह राजगृह की सड़क है। तब बुद्ध ने कहा तुम्हारे बताए रास्ते पर चलकर संभव है कि एक राही राजगृह पहुंच जाए, लेकिन हो सकता है कि कोई दूसरा भटक जाए और वह न पहुंच सके। मोग्गलाला ने कहा कि क्या यह भी मेरा काम है, गुरुदेव? मैंने तो बस रास्ता दिखाया। तब बुद्ध ने कहा कि मैं भी केवल रास्ता दिखाता हूं। मेरे कुछ अनुयायी पहुंच जाते हैं और कुछ नहीं पहुंचते हैं। गुरु का काम सिर्फ रास्ता दिखाना है।
धर्म के नाम पर जब चारों ओर हिंसा का वातावरण है तथा तभी धर्मगुरु अपने-अपने ईश्वर के श्रेष्ठता बखान में दिन-रात एक कर दे रहे हैं। वे अपने ईश्वर, अल्लाह तथा मसीह आदि को अविनाशी, अजर और अमर बनाने पर तुले रहते हैं। तो वहीं पर बुद्ध को इस बात का संदेह रहता है कि जो मार्ग उन्होंने दिखाया है क्या वह स्थायी है, क्या लोग उस पर चलेंगे? इसी संदर्भ में एक बार एक मठवासी किम्बिल ने उनसे यह सवाल पूछा कि क्या धम्म (धर्म )उसके संस्थापक की मृत्यु के बाद भी रहेगा। तब बुद्ध ने जो उत्तर दिया उससे यही लगा कि उन्हें स्वयं भी संदेह था कि धम्म उनकी मृत्यु के पश्चात अधिक दिन तक चल सकेगा। उन्हें इस बात पर भी संदेह था कि मठवासी भाई-बहन तथा भिक्षु भिक्षुणियां मठ व्यवस्था और धम्म सिद्धांतों का पालन करेंगे। वे यहां तक मानते थे की धम्म सीखने का अवसर न पाने वाले लोग हो सकता है कि सर्वोत्कृष्ट कार्य करें और धर्म के सारे मार्ग को जानने वाले लोग भी उस पर अमल ना करें।
सादा जीवन और उच्च विचार की जो आनंदमय पद्धति है बुद्ध उसके कायल थे। वे विलासिता तथा वंचना के अति बचकर मध्यम मार्ग के अनुयायी थे। यह वह मार्ग है जिस पर चलकर हम आप अपने लक्ष्य को आसानी से हासिल कर सकते हैं। एक समय ऐसा भी था जब बुद्ध ने स्वयं अतिसंयम का पालन करते हुए अपने को भोजन-वस्त्र तथा घर आदि से वंचित कर रखा था। उन्हें यह विश्वास था कि एकाकी जीवन शैली अपना कर ही अन्य लोगों को पीछे छोड़ा जा सकता है। लेकिन तभी उनके मन में यह विचार आया कि क्या यही ज्ञान का मार्ग है? मैं सहज स्थिति में क्यों डरता हूं? जिसमें ऐन्द्रिक इच्छाओं और इस दयनीय स्थिति दोनों से मुक्ति मिल सके। इस अति की वर्जना को नि:सार मानकर इसे खारिज करते हुए वे मठवासियों के लिए रोटी, कपड़ा, मकान तथा दवाओं आदि की बात करने लगते हैं। पर वे इस बात की पुरजोर पहल करते हैं कि यह जो भोग होगा वह एक तरह से त्यागपूर्ण होगा। इसका उन्होंने सदैव ख्याल रखा है।
इस मशीनी तथा पूंजीवादी युग में जहां नित नए-नए उद्योग स्थापित किया जा रहे हैं वहीं परिवहन के साधनों के असीमित उपभोग से पर्यावरण पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। शहरीकरण,औद्योगिकरण तथा पेड़ पौधों के निरंथर विनाश से बड़े-बड़े शहर गैस के चेंबर बनते जा रहे हैं। शीत ऋतु में इन कार्बनों का जमाव धरातल पर इस कदर हो जाता है कि दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद तथा लखनऊ जैसे शहरों में सांस लेना दुर्लभ हो जाता है। ऐसे समय में बुद्ध की, हमारे पर्यावरण को लेकर क्या संवेदनशीलता तथा सोच थी इसकी प्रासंगिकता बढ़ जाती है।बुद्ध ने अपने अनुयायियों को जो भी शिक्षा देने का प्रयास किया है उसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य का बाखूबी ध्यान रखा है। उन्होंने मठवासियों के लिए यह नियम बना दिया था कि वे बरसात के मौसम में धर्म प्रचार के लिए बाहर नहीं जाएंगे और मठ में रहेंगे। इसका कारण यह था कि उस मौसम में धरती अपने खालीपन को भरने के लिए तैयार होती है, नए अंकुर फूटते हैं, हरे पौधे बढ़ते हैं और ऐसे में मठवासियों के पैर नीचे दबकर कहीं वे कुचल ना जाएं। यह प्रकृति के प्रति प्रेम तथा संवेदनशीलता उनमें संभवतः तब विकसित हुई होगी जब वे भिक्षुक की तरह भटक रहे थे। अपने जीवन के अंतिम दौर में बुद्ध विभिन्न उद्यानों तथा उपवनों जैसे श्रावस्ती का जेतवन उद्यान, वैशाली का विशाल उपवन तथा राजगृह का विशाल मैदान आदि।
आधुनिक विज्ञान ने मनुष्य को अधिक से अधिक घातक हथियार तथा हिंसा के साधन उपलब्ध करा दिए हैं। विश्व मानचित्र पर यदि निगाह डाले तो कहीं न कहीं दो देशों में अपने-अपने थोड़े से स्वार्थों के लिए युद्ध होते रहते हैं। ग्लोबलाइजेशन के दौर में इस आपसी लड़ाई में वे देश जो आमने-सामने युद्ध कर रहे हैं इसके दुष्परिणाम तो झेलते हैं। साथ ही साथ इसका प्रभाव विश्व अन्य देशों पर भी पड़ता है। इसीलिए हिंसा पर रोक लगाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता आन पड़ी है। यही कारण है कि बुद्ध जिस सौहाद्र तथा मैत्री की बात करते हैं वह आज ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। यद्यपि अन्य धर्मों के संस्थापक भी इस बात पर बल देते हैं पर बुद्ध के उपदेशों का केंद्रीय विषय यही रहा है। भारत तथा अन्य देशों में जहां भी लोग बुद्ध को जानते हैं उन्हें अहिंसा तथा सौहार्द्र के प्रतीक के रूप में मानते हैं।‌ अगर इतने सशक्त रुप से अहिंसा के सिद्धांत का पालन हम सभी नहीं कर सकते हैं तब भी नैतिक मूल्य के रूप में ये हमें प्रेरणा देते रहते है।
बुद्ध संघ के जो नियम तथा संस्कार थे वे काफी कठोर थे। जिसका पालन प्रत्येक भिक्षु को करना होता था। एक भिक्षु के लिए यह नियम था कि वह मठ पर पहुंचने से पहले अपनी चप्पल उतार दें, उन्हें नीचे रख दें, उन्हें एक दूसरे पर पटक कर झाड़े,अपना छाता सावधानी से रखें तथा बिना किसी हड़बड़ी के सावधानी पूर्वक आवास में प्रवेश करें। सभी मठवासियों को इस बात का निर्देश था कि वे समय गवानें,गप्पबाजी करने,कुसंगति तथा विलासिता के प्रति मानसिक रुझान से बचे। यह आवश्यक समझा जाता था कि मठवासी की छवि शांति,प्रकृतिस्थ और धीर गंभीर हो। यदि कोई संघ के नियमों का उल्लंघन करता था तो उसे संघ से निष्कासित कर दिया जाता था। बुद्ध की ये नियम एक तरह से नैतिकता, संयम, त्याग तथा जीवन मूल्यों की शिक्षा देते हैं। ऐसे आदर्शो तथा मूल्यों की प्रासंगिकता आज के उच्छृंखल तथा बदनीयत समाज को सयंमित करने के लिए कहीं अधिक है।
इस प्रकार कह सकते हैं कि बुद्ध ने अच्छे तथा बुरे स्वभाव के सभी लोगों को शिक्षित करने का प्रयास किया है।यह उनके धम्म तथा शिक्षा के आदर्श व मूल्य ही है जो आज भी समाज को सही दिशा व दशा प्रदान कर रहें हैं।

नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती
मो. 8400088017