
ग़ज़ल
तोड़ दी हर रस्म हर ज़ंजीर है
ये तुम्हारे इश्क़ की तासीर है
एक हम दोनों की अब तकदीर है
एक हम दोनों की अब तदबीर है
आईने में देख लूँगी मैं तुझे
मेरी आँखों में तेरी तस्वीर है
मेरी पलकों पर तुम्हारे होंठ हों
हाँ यही तो ख़्वाब की ताबीर है
ज़ीस्त मेरी एक रेगिस्तान-सी
प्यार तेरा दून है कश्मीर है
तुम ज़रा-सा ज़ख्म कहते हो जिसे
घाव ये दिल का बहुत गंभीर है
अब न आंसू ढूंढ मेरी आँख में
इस नदी में अब न बाक़ी नीर है
इश्क़ अब होता है टाइमपास को
अब कोई राँझा न कोई हीर है
अच्छे-अच्छे जिसके क़दमों में झुके
वक़्त वो पहुंचा हुआ इक पीर है
दिन ब दिन बढ़ता गया घटता नहीं
दर्द गोया द्रौपदी का चीर है
क्यूँ कोई तुझको पढेगा ऐ ‘किरण”
तू कोई ग़ालिब न कोई मीर है
©डॉ कविता”किरण”
Kavita Kiran