ओ३म्
“कीर्तिशेष ऋषिभक्त आर्य-भजनोपदेशक पं. सत्यपाल सरल”
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उन्नीसवीं शताब्दी व उसके बाद देश में जन-जागरण में आर्यसमाज व इसके भजनोपदेशकों का विशेष योगदान रहा है। देश विदेश में आर्य भजनोपदेशकों ने प्रशंसनीय जागृति पैदा की है। आर्य भजनोपदेशकों के इस योगदान को कुछ आर्य इतिहासकारों ने अपनी आंखों से ओझल कर दिया। पं. चन्द्रकवि, कुंवर सुखलाल, स्वामी नित्यानन्द, स्वामी धर्मानन्द आदि ऐसे अनेक आर्य भजनोपदेशक हुए हैं जो हंसते हुए स्वतन्त्रता आन्दोलन में जेल गये और वहां देश की आजादी के लिए यातनायें सहन की। आज भी आर्यजगत् में अनेक आर्य भजनोपदेशक धर्म प्रचार, समाज सुधार, राष्ट्रीय भावना को जागृत करने के कार्य में संलग्न हैं। दिनांक 27 जनवरी, 2025 की सायं को दिवंगत आर्य भजनोपदेशक श्री सत्यपाल सरल इसी परम्परा के भजनोपदेशक रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से वह रक्त में कैंसर के रोग से पीड़ित थे। रोग से पीड़ित रहे सरल जी ने रोग अवधि में भी स्वाध्याय व लेखन का कार्य किया और स्थानीय व निकटवर्ती स्थानों की यात्रायें की। वर्ष 2024 के अजमेर के ऋषिमेले में भी वह सम्मिलित हुए थे।
उत्तराखण्ड राज्य का हरिद्वार जनपद पौराणिक दृष्टि से देश व विश्व का महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान है। कल्याणकारी गंगा नदी का अवतरण हिमालय के बाद इसी स्थान पर हुआ है। हरिद्वार जनपद में इस पवित्र गंगा नदी के तट पर निरजंनपुर ग्राम स्थित है। यह ग्राम लम्बे समय तक धार्मिक व सामाजिक दृष्टि से अज्ञान, अविद्या व पाखण्डों से ग्रस्त था। सौभाग्य से ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने देश में जो धार्मिक एवं सामाजिक क्रान्ति सहित समग्र क्रान्ति की, उससे यह ग्राम भी प्रभावित होकर आलोकित हो उठा। 15 अप्रैल, सन् 1925 को ग्राम निरंजनपुर में आर्यसमाज की स्थापना हुई। आर्यसमाज के प्रचार से इस ग्राम में अन्धविश्वास एवं अविद्या की नींव हिल गई और यहां के अनेक निवासियों ने आर्यसमाज की विचारधारा को अपनाया लिया था।
इस निरंजनपुर ग्राम में ही हमारे ऋषिभक्त भजनोपदेशक श्री सत्यपाल ‘सरल’ जी का जन्म 2 मई, सन् 1947 को माता बिरमो देवी एवं पिता श्री सीताराम आर्य के यहां हुआ। आपने प्राथमिक शिक्षा अपने ग्राम में ही प्राप्त की। इसके बाद की शिक्षा प्राप्त करने का ग्राम में कोई प्रबन्ध नहीं था। आपके पिता यद्यपि अपढ़़ थे परन्तु वह धार्मिक, भावनाशील, शिक्षा-प्रेमी एवं आर्यसमाज की विचारधारा व सिद्धान्तों से प्रभावित थे। वह अपने इस पुत्र को शिक्षित कर योग्य पुरुष बनाना चाहते थे। प्रवर आर्य भजनोपदेशक श्री बृजपाल शर्मा ‘कर्मठ’ जी से आपके निकट संबंध थे। आपने अपने पुत्र सत्यपाल को उनके पास अध्ययन आदि करने के लिए भेज दिया। आपने उनके साथ रहते हुए हाईस्कूल और बी.टी.सी. किया और इसके साथ ही वेद प्रचार की संगीतमयी विद्या में निपुण हुए। इसके बाद आप सर्वात्मा भजनोपदेशक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
ऋषि भक्त श्री सत्यपाल ‘सरल’ 7 नवम्बर, 1966 ईसवी को दिल्ली में गोरक्षा आन्दोलन में सोत्साह सम्मिलित हुए थे और गोरक्षा आन्दोलन की सफलता के लिए किए गये संसद भवन के घेराव में भी आप सम्मिलित थे। आपने इससे पूर्व गांव-गांव में जाकर युवकों को गोरक्षा आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया था। श्री सरल जी ने भजनोपदेशक के रूप में आर्यसमाज की प्रशंसनीय सेवा की है। आपने अपने गांव में आर्य वीर दल की स्थापना 1 जनवरी सन् 1969 को की। आपके उत्साहवर्धक कार्यों से प्रभावित होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश आर्य वीर दल के संचालक श्री बाल कृष्ण विकल ने आपको मेरठ मण्डल का संचालक नियुक्त किया था।
श्री सत्यपाल सरल जी का विवाह श्रीमती सुशीला देवी जी के साथ 20 मई सन् 1972 को हुआ था। श्रीमती सुशीला जी धर्मपरायणा एवं मृदु भाषी गृहिणी होने के साथ अपने नाम के अनुरूप सुशील स्वभाव की धनी हैं। सरल जी के दो पुत्र श्री अवनीश आर्य एवं नवनीत आर्य हैं और पुत्र वधुएं क्रमशः श्रीमती संगीता आर्या और श्रीमती मीनाक्षी आर्या हैं। आपका परिवार तीन पौत्रों से भी समृद्ध एवं सुशोभित है। परिवार के सभी सदस्य ऋषिभक्त हैं एवं वैदिक विचारधारा का श्रद्धापूर्वक अनुसरण करते हैं।
मार्च 2018 में एक भेंट में हमने श्री सरल जी से उनके निजी जीवन पर बात की थी। हमने अनुभव किया है कि सरल जी वैदिक सिद्धान्तों पर अटूट आस्था एवं विश्वास रखते हैं। वैदिक सिद्धान्तों में गहरी आस्था के कारण विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धान्तों का पालन किया है। जब उनके पिता की मृत्यु हुई तो उनके परिवारजनों एवं संबंधियों ने उन पर पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हरिद्वार में गंगा नदी में अस्थियां प्रवाहित करने का दबाव बनाया था। उन्होंने सरलजी को तेरहवीं सहित ब्रह्मभोज तथा पगड़ी आदि की रस्म करने का परामर्श भी दिया था। सरल जी ने अपने संबंधियों के परामर्शों को सुना और उन्हें अस्वीकार कर दिया था। सरल जी ने उन्हें उत्तर दिया था कि वह सभी कार्य वैदिक सिद्धान्तों व रीतियों के अनुसार करेंगे। सरल जी का यह उत्तर सुनकर उनके कुटुम्बीजन उनसे नाराज हो गये थे। उन्होंने वैदिक मान्यताओं के अनुसार क्रियायें करने के कारण उनका बहिष्कार किया। इस पर भी सरल जी ने वैदिक मार्ग का ही अवलम्बन किया। उन्होंने इस अवसर पर किसी भी पौराणिक कर्मकाण्ड को स्वीकार नहीं किया और सभी कार्य वैदिक रीति के अनुसार सम्पन्न किये गये। सरल जी अपने उन निकट सबंधियों से भी दूरी बनाकर रखते थे जो मदिरापान आदि दुव्र्यसनों से ग्रस्थ थे। हमारी परस्पर निकटता के कारण हमें इन बातों का ज्ञान रहा है।
श्री सरल जी के आचार-विचारों से प्रभावित होकर ग्राम निरजंनपुर के एक बड़े जमीदार ने आर्यसमाज के लिए अपनी भूमि दान में दी। इस भूमि पर आर्यसमाज मन्दिर का निर्माण हुआ। सरल जी ने सन् 2000 में देहरादून में श्री मद्दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, पौन्धा की स्थापना के समय से गुरुकुल को अप्रैल व मई के दो महीनों का समय देना आरम्भ किया था। इस अवधि में वह गुरुकुल के आचार्य धनंजय जी के साथ निकटवर्ती राज्य हरयाणा, उत्तरप्रदेश व उनके ग्रामों में जाकर अन्न संग्रह का कार्य कराया करते थे। उन्होंने अपने परिचित आर्य परिवारों से भी आचार्य जी का परिचय कराया था जिससे उन्हें उनसे अन्न व धन की सहायता प्राप्त होती रही है। यह लोग गुरुकुल से जुड़े थे और इन्होंने गुरुकुल के उत्सवों में भी सोत्साह आना आरम्भ किया था। वर्तमान में यह गुरुकुल शिक्षा के स्तर की दृष्टि से देश का एक प्रमुख गुरुकुल है जिसका श्रेय स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी एवं आचार्य डा. धनंजय जी को तो है ही साथ ही हमारे सरल जी जैसे ऋषिभक्तों के पुरुषार्थ एवं गुरुकुल से जुड़े ऋषिभक्त आर्यजनों को भी है।
आर्यसमाज के सच्चे विद्वान भजनोपदेशकों ने अतीत में बिना किसी एषणा के गांव-गांव में आर्यसमाज खड़े किये। दुर्भाग्य से ऐसे सिद्धान्तनिष्ठ व ऋषिभक्तों की आर्यसमाज ने उपेक्षा भी की है। आर्यसमाज के भजनोपदेशकों का उत्साह एवं स्वाभिमान बना रहे, इस पवित्र भावना से श्री सत्यपाल सरल जी ने ‘आर्य भजनोपदेशक समिति’ नामक संगठन की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। समिति की स्थापना के आरम्भ के दिनों में इस संगठन ने सराहनीय कार्य किये, यह बात हमें सरल जी ने अपनी भेंट में बतायी थी। बाद में किन्हीं कारणों से इस समिति की गतिविधियां शिथिल हो गई थी।
श्री सरल जी अपने ग्राम निरंजनपुर से अक्तूबर, 1985 में देहरादून आये और यहीं पर परिवार सहित निवास करने लगे। यहां उनका निजी निवास है जहां वह अपने दोनों पुत्रों के परिवार सहित सुखपूर्वक निवास कर रहे। अपने ग्राम निरंजनपुर से भी उनका सम्पर्क बना रहा। देहरादून के आर्यसमाज से जुड़े सभी बन्धु उनका सम्मान करते थे। आपके ग्राम निरंजनपुर में जब भी आर्यसमाज का कोई कार्यक्रम होता था, सरल जी उसमें सम्मिलित होते थे।
श्री सरल जी का भजनोपदेशों द्वारा प्रचार केवल मनोरंजन के लिए नहीं था अपितु इसके माध्यम से वह आर्यों को असत्य का त्याग कराने, ईश्वर उपासना के लिए प्रेरित करने सहित राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा करते थे। भजनों में सुन्दर प्रभावशाली शब्द व वाक्यों का चयन एवं उनका प्रभावपूर्ण प्रस्तुतिकरण मनुष्य के विचारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने में सक्षम होता है। इसको अपने विचारों व भावनाओं के केन्द्र में रखकर ही वह ऋषि मिशन के प्रचार के कार्य में प्रयत्नशील रहे। आपकी कविताओं की कुछ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। कुछ समय पूर्व बाल्मीकि रामायण पर आधारित श्री रामचन्द्र जी के चरित पर भी उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने अपनी निज-कविताओं में भी श्री रामचन्द्र जी का चरित्र-चित्रण किया है। इसकी एक प्रति श्रद्धेय सरल जी ने हमें भी भेंट की थी। हम ऋषिभक्त, सरल हृदय एवं स्वाभिमानी श्री सत्यपाल सरल जी को हृदय से श्रद्धांजलि प्रस्तुत करते हैं। हम आशा करते हैं कि उनकी सामाजिक सेवाओं को आर्यसमाज याद रखेगा और उनसे प्रेरणा ग्रहण कर वेदप्रचार के कार्यों में तन, मन व धन से सहयोग करेगा। आर्यकवि कवि कस्तूर चन्द ‘घनसार’ जी की श्री सत्यपाल सरल जी पर एक कविता की कुछ पंक्तियां देकर इस लेख को विराम देते हैं:
सरल-सरस गान मधुर आवाज साथ, वाद्य ताल सुर-शुद्ध-गायक सुभाषते।
गीत ज्ञान गुण नेक विवेक विचार शुद्ध, आर्य उपदेशकसों बोलते उलासते।
आर्य जगत में यत्र तत्र भाषण सरल रस, सुवासित भव्य भाव विभोर विलासते।
आर्यावर्त में प्रचार विशद् कर, आर्य सत्य वैदिकसों प्रचार प्रकाशते।
सत्यपाल ‘‘सरल” जी तरल तरुण वय, सुशोभित सभा मध्य मधुर सुगानते।।
-मनमोहन कुमार आर्य