गोरखनाथ के योग की महिमा से प्रभावित होकर राजा भरथरी अपना राजपाट तथा सैकड़ो रानियों और भोग विलास को छोड़कर शरीर पर भस्म लगाकर जोगी बन जाते हैं। इस योग में उन्हें जो आनंद मिला वह राज पाठ के सुख सुविधाओं में नहीं था। सचमुच गोरखनाथ का यह योग न केवल आत्मा परमात्मा को जोड़ने का रास्ता बताता है बल्कि एक अनुशासित तथा संयमित जीवन जीने प्रेरणा भी देता है। तभी तो राजा भरथरी मस्ती से गाते हैं-
जग में अमर राजा भरथरी
छोड़े गढ़ उज्जैन का राज
हथवा लिए सरंगिया
बना है राजा भिखरिया हो
गुदरिया गले में डाले भरथरी
राजा भरथरी बन भिखारी
राजपाट बिसराई
गोरख के अजब तन में भस्म रमाई
राजा बना भिखारिया हो।।
गोरखनाथ और उनके द्वारा प्रभावित योगमार्गीय ग्रंथों के अवलोकन से स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने योग मार्ग को एक व्यवस्थित रूप दिया है। उन्होंने शैव सिद्धांतों के आधार पर काया योग के साधनों को व्यवस्थित रूप किया। संस्कृत भाषा के बजाय लोक भाषा में योग के इन सिद्धांतों का प्रचार प्रसार किया। इनके योग साधना का मुख्य ध्येय किसी प्रकार से चित्तवृत्तियों की बर्हिमुखता या बहुमुखता को एकमुख करना है। जिसके द्वारा साधक के सभी भाव, ज्ञान तथा कर्म केंद्रीभूत हो जाए तथा उनके जीवन में साम्य और शांति आ जाए। वे पूर्ण रूप से आत्मनिष्ठ हो जाए। उनका मानना था कि योग की प्रत्येक क्रिया प्रत्यक्ष प्रमाणों पर आश्रित है किंतु ज्ञानी गण वस्तुत: शास्त्रीय वाक्य के विनिश्चय में ही आस्था रखा करते हैं। गोरखनाथ का यह योग मार्ग वेदांत में वर्णित योग परंपरा से भिन्न मिलता है। वेदांत में केवल आत्म चिंतन व विचार पर अधिक बल दिया गया है जबकि गोरखनाथ का मानना था कि जब तक शरीर और उसकी इंद्रियां अपने बस में नहीं लाई जाती, प्राणों का नियमन नहीं किया जाता, चित्तवृत्तियों को निरुद्ध नहीं किया जाता तब तक हमें आत्मतत्व की झलक नहीं मिल सकती है।
योग साधना के क्षेत्र में गोरखनाथ को हठयोग का प्रवर्तक माना जाता है। हठयोग का अर्थ बताते हुए जेसन वर्च लिखते हैं कि हठ शब्द का प्रयोग कभी भी हिंसात्मक साधनों के प्रयोग या बलपूर्वक किए गए प्रयास के अर्थ में नहीं किया गया है। उनका तर्क है कि इसका प्रयोग कुंडलिनी जागरण के अर्थ में हुआ है। इस शब्द का आरंभिक प्रयोग गुहा समाज तंत्र नामक बौद्ध ग्रंथ के अट्ठारहवें अध्याय में किया गया है। नेराल्ड लार्सन का मानना है कि हठयोग शब्द संबंधों को स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करता है। जैसे श्ववसों का संयोग, स्त्री-पुरुष संयोग, ध्वनि तथा मौन का, व्यष्टि तथा समष्टि का और अंततः शिव तथा शक्ति का संयोग द्योतित होता है। गोरखनाथ ने इस शब्द का प्रयोग साधना तथा संयोग के अर्थ में ही किया है। उनका कहना है कि शरीर के नवों द्वारों को बंद करके वायु के आने-जाने का मार्ग यदि अवरुद्ध कर लिया जाए तो उसका व्यापार चौंसठ संधियों में होने लगेगा। इससे निश्चय ही कायाकल्प होगा और साधक एक ऐसी सिद्ध में परिणत हो जाएगा जिसकी छाया नहीं पड़ती। इस साधना के द्वारा ब्रह्मारन्ध्र तक पहुंच जाने पर अनाहत नाद सुनाई पड़ता है जो समस्त तत्वों का भी सार है और गंभीर से गंभीर है। इससे ब्रह्मनुभुति की स्थिति उपलब्ध होती है जिसे स्वसंवेद्य होने के कारण कोई शब्दों द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। तभी प्रतीत होने लगता है कि उसके अतिरिक्त सारा विवाद झूठा है। इस हठयैग का अनुसरण करने पर परमात्मा आत्मा में वैसे ही दिखने लगता है जैसे जल में चंद्रमा प्रतिबिम्बित होता है। ऐसे में पंडितों को चाहिए कि वे कोरे अध्ययन में लीन ना रहकर उक्त मार्ग के माध्यम से साधना करके अमरत्व को प्राप्त कर सकते हैं।
इन्होंने अपने योग-साधना में काया-शोधन के साथ-साथ आत्मचिंतन को भी स्थान दिया है। ध्यान और योग के माध्यम से हम इस दशा में पहुंच सकते हैं जहां वाणी के बिना भी धुन सुनाई देने लगती है। इसी को ये अजपा-जाप कहते हैं। जहां साधना के लिए हमें साधन की जरूरत नहीं होती है। वे कहते हैं कि दशम द्वार अथवा ब्रह्मरंध्र में सदा ध्यान केंद्रित रखो, निराकार पद का सेवन करो, अजपा-जाप जपो और आत्म तत्व पर विचार करो। इससे सभी प्रकार की व्याधियां दूर हो जाएंगी तथा पुण्य या पाप किसी से संसर्ग नहीं रह जाएगा। निरंतर एक समान व सच्चे हृदय के साथ राम में रमना ही केवल एकमात्र उद्देश्य है। और इसी के द्वारा मुझे भी परम निधान व ब्रह्म पद उपलब्ध हुआ है। वे किसी वाह्य वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने के खिलाफ थे। उनका मानना था की आत्मा सर्वव्यापक है अतः उसी पर ध्यान लगाया जाए। उनके अनुसार आत्मा ही मछली है,वही जाल है, वही धीवर है और वही काल भी है। वह स्वयं मारता है और स्वयं खाता है। वही माया के रूप में अनेक बंधन डालता है। और वही जीवन बनकर उसमें पड़ जाता है। उसके बाहर कोई तीर्थ नहीं, जहां स्नान किया जाए और ना कोई देवता है जिसका पूजन किया जाए। वह अलक्ष व अभेद है, किंतु जो कुछ भी है वही है।
एक योगी की साधना काफी कठिन होती है। उसे समाज के मोह माया से दूर रहकर अपनी साधना में रत रहना होता है। पथभ्रष्ट करने वाली प्रवृत्तियों का निरंतर दमन करने का उन्हें सदैव यत्न करना होता है। इन विषय वासनाओं से बचाना निश्चित ही कठिन है पर एकमात्र योगी ही है जो अपनी मानसिक दृढ़ता से यह संभव बनाता है। वह निरंतर उन भगवान शिव पर स्वयं को एकाग्र रखता है जो नाना आसक्तियों के समक्ष डिगते नहीं है। अपने दृढ़निश्चय से जब योगी की एकाग्रता सिद्ध हो जाती है तो उसे परमानंद की प्राप्ति होती है। उसे यह सारा संसार परमेश्वर की लीला भूमि प्रतीत होने लगती है-
अनं मांहि निरंजन भेट्या, तिलमुष भेट्या तेलं।
मूरति मांहि अमूरति परस्या, भया निरंतर षेलं।।
योगी को अपने काया और मन पर कठोर अनुशासन करना होता है। काया के अनुशासन से ही मन को अनुशासित किया जा सकता है। और जब यह दोनों नियंत्रित हो जाते हैं तो मेरुदंड के मूल में बैठी कुंडलिनी शक्ति ऊर्ध्व मुखी होती है और ब्राह्मण्डीय शक्ति में मिल जाती है। इसी सर्वोच्च शक्ति को नाथ संप्रदाय में शिव या आदि शिव के रूप में जाना जाता है। कुंडलिनी जागरण कि यह प्रक्रिया साधक के विशिष्ट इच्छा के निरंतर बलवती होने पर निर्भर करती है। इच्छा की मजबूती के साथ-साथ योगी की मनोदशा भी शुद्ध होनी चाहिए। साधक को यह मन: स्थिति बहुत मुश्किल से मिल पाती है । क्योंकि हम सामान्यतः पद,पैसा तथा प्रतिष्ठा जैसी सांसारिक चीजों में उलझे रहते हैं। ऐसे में सामान्य मनुष्य उस योग साधना में प्रवृत्त नहीं हो पता है जैसाकि नाथ संप्रदाय में अभीष्ट होता है।
नाथ संप्रदाय के योगियों में स्त्री पुरुष के संभोग को निषिद्ध किया गया है। वे योनि को पिशाच के रूप में चित्रित करते हैं। इसका मकसद यौन संबंधों को हतोत्साहित करना है। योग संप्रदाय में वीर्य को अमृत माना गया है। ऐसे मे स्त्री पुरुष संबंधों में इनका क्षय होना मुनासिब नहीं समझते हैं। उनका मानना है कि अमृत पुरुष के सिर में स्थिर रहता है। बिंदु के रूप में बूंद-बूंद करके वह मेरुदंड में टपकता रहता है। जब तक कि वह वीर्य के रूप में यौन संबंध के परिणाम स्वरुप शरीर से बाहर नहीं निकल जाता है। इसीलिए योगी इस बात पर बल देते हैं कि योगिक क्रियाओं के द्वारा वीर्य को उसके मूल स्थान में अवस्थित करने की आवश्यकता है। शैव संन्यासी और भक्तगण अपने शरीर में विभूषित करने के लिए तथा अपने सांप्रदायिक चिह्न के लिए जिस राख का प्रयोग करते हैं वह भस्मीभूत वीर्य है जो उनकी काम प्रवृत्ति पर विजय का प्रतीक होता है। चूंकि गोरखनाथ को शिव और शक्ति का संतान माना जाता है अतः उनमें ऐसी प्रवृत्ति का मिलना स्वाभाविक है।
इस योग-साधना में गुरु को अतिविशिष्ट स्थान दिया गया है।
गुरु के बिना कोई भी मनुष्य सिद्धि को नहीं प्राप्त कर सकता है। वह गुरु ही है जो हमारे मन तथा नेत्रों के चक्षु को खोलता है जिससे हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है-
गुरु की जै गहिला निगुरा न रहिला।
गुरु बिनं ग्यानं पाईला रे भाईला।।
योगी के स्वभाव में शील का होना नितांत आवश्यक है। गोरखनाथ का मानना है की शील एक तरह से योगियों का आभूषण होता है जो उनके व्यक्तित्व में चार-चांद लगाता है। शील गंगा जल के समान पावन होता है जो हमारे मन, शरीर व आत्मा को पवित्र करता है-
सहज सील का धरै सरीर।
सो गिरती गंगा का नीर।।
यह सही है कि गोरखनाथ गृहस्थजन को एक दयनीय समूह मानते थे। मनुष्य एक बार जब गृहस्थ बन जाता है तो उसे ज्ञान प्राप्त करना तो दूर उसकी चर्चा करने का भी अधिकार नहीं रह जाता है। गृहस्थो की तुलना उन्होंने समाज के निकृष्ट वर्गों से किया है-
गिरह होय करि कथै ग्यांन, अमली होय करि धरै ध्यांन।
वैरागी होय करै आसा, नाथ कहै तीनों षासा पासा।।
गृहस्थ के प्रति हेय दृष्टि रखते हुए भी गोरखनाथ ने कतिपय गृहस्थ संन्यासियों को नाथ संप्रदाय में स्वीकार किया है। गृहस्थ साधकों की विलक्षण आध्यात्मिक संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने अपने संप्रदाय के जो कठोर नियम थे उसमें थोड़ी सी शिथिलता बरती है। महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहन नाथ पंथ की गृहस्थ सन्यासियों के रूप में जाने जाते हैं।
यह सच है कि गोरखनाथ एक योगी थे पर वे एक महत्वपूर्ण सुधारक भी थे। उनके पूर्व योग साधना के जो मार्ग जैसे कर्मयोग राजसी प्रकृति वालों के लिए, भक्तियोग भाव प्रवण व्यक्तियों के लिए तथा ज्ञान योग दृढ़ व तीक्ष्ण बुद्धि सामर्थ्य वालों के लिए था। इन साधनाओं का में काफी विकृतियों आ गई थी और इनमें आपस में विरोध की स्वर भी मिलते थे। ऐसे में गोरखनाथ ने उन परंपराओं की मौलिकता को सुरक्षित रखते हुए उसमें सुधार किया तथा उसे नाथ संप्रदाय का अंग बनाया। जो सुधार से परे था उसे बाहर का रास्ता दिखाया। उस समय भिन्न-भिन्न योग पद्धतियों के आधार पर नाथ संप्रदाय में तीस उप संप्रदाय थे। इनमें से अट्ठारह का उद्गम शिव से और बारह गोरखनाथ से मानते थे। गोरखनाथ ने दोनों समूह से छह-छह संप्रदायों को चुनकर मान्यता प्रदान किया और उसकी विकृतियों को दूर किया। इस प्रकार उन्होंने योग संप्रदाय में एक नये जीवन का संचार किया।
योग-साधना में गुरु गोरखनाथ के योगदान की चर्चा करते हुए योगिराज भर्तृहरि का कहना है कि महायोगी सिद्ध गुरु की प्राप्ति से अज्ञान मिट गया और हमारे ध्यान में अलख निरंजन प्रत्यक्ष हो गया। हमें घर-घर में ब्रह्म का दर्शन हो गया। सब में एक ही परमात्मा है, इसीलिए किसी को ना सताना चाहिए ना मारना चाहिए। गोरखनाथ गुरु से हमें योगज्ञान मिल गया और हमने सब जगह अलख पुरुष की ज्योति का साक्षात्कार कर लिया। हमने सहज अविनाशी परमात्मा हरि के पद का स्पर्श कर लिया और अनुभव कर लिया है। मैंने सद्गुरु द्वारा पदत्त योगज्ञानामृत से योग में सिद्ध प्राप्त कर ली है-
सतगुरु सबद राजा भरथरी सीधा रे।
गुरु गोरख वचन प्रवाणंजी।।
नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती (उ.प्र.)
मो.8400088017