*कैंसे हो युवक!*आचार्य सुरेश जोशी

🪷 *ओ३म्*🪷
🕉️ कैंसे हो युवक!🕉️
आर्य समाज मंदिर इंदिरा नगर लखन ऊ के ४९ वें वार्षिकोत्सव के प्रथम दिवस पर एक *वैदिक सेमिनार* का आयोजन किया ।जिसका विषय था *💪बाल/किशोर एवं युवा सम्मेलन* 💪 इस विषय विवेचन ईश्वरीय वाणी वेद द्वारा किया गया जिसका वर्णन अथर्वेद-१२/१/१ में इस प्रकार है।
*सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथिवीं धारयंति।*
*सा नो भूतस्य पत्न्यरु लोकं पृथिवी न: कृणोतु।*
युवाओं के निर्माण दो दो विचारणीय विंदु है।प्रथम उनका शारीरिक विकास।शारीरिक विकास में *रोटी -कपड़ा व मकान* मुख्य होता हैजिसके आधार पर वह समाज में खड़ा होता है। दूसरा है उसका आध्यात्मिक विकास जिसमें *चरित्र निर्माण मुख्य* है। चरित्र को बनाने के लिए आठ गुणों का समायोजन अति आवश्यक है।इन्हीं गुणों का वर्णन उपरोक्त वेद मंत्र में है।क्रमश: इन पर चिंतन करते हैं।
*प्रथम गुण सत्यम्*
युवाओं को सत्य को व्यावहारिक जीवन का अंग बनाना जरुरी है।आज का युवा कल का *उद्योगपति, न्यायाधीश,राजनेता व समाज-सुधारक* है।मगर आज के व्यापारी,न्यायाधीश,राजनेता व समाज सुधारक कहते हैं कि जैंसे दाल में नमक होता है वैंसे जीवन को चलाने में दाल में नमक की तरह झूठ आवश्यक है।
इस समस्या का एक ही समाधान है कि युवकों को सत्य का अभ्यास घर से प्रारंभ करना होगा।वह पहले माता,पिता,आचार्य ,मित्र से सत्य बोलना प्रारंभ करे एक दिन वह वैश्विक स्तर पर सत्यवादी बन सकता है।
*दूसरा गुण बृहत्*
बृह उद्यमने धातु से बृहत शब्द बनता है जिसका अर्थ है उद्यम अर्थात् युवाओं को *परिश्रमी होना चाहिए भाग्यवादी नहीं।* परिश्रमी युवक शरीर से निरोग ,मन से पवित्र,बुद्धि से कुशाग्र होते हैं।
*तीसरा गुण ऋत्*
ऋत का मतलब है देश के युवा व्यवहार में *सरल एवं निश्छल* हों। हम जैंसा व्यवहार अपने लिए नहीं चाहते वैंसा व्यवहार दूसरों के लिए कभी न करें।मन-वचन-कर्म से एक और नेक बनें!
*चतुर्थ गुण उग्रम्*
उग्रम का अर्थ यहां पर उग्र होना नहीं है।उग्रम का तात्पर्य है कि हमारे युवक *आर्य वीर* हों।क्योंकि सत्य की रक्षा के लिए शक्तिमान होना बहुत आवश्यक है।महर्षि मनु कहते हैं।दंड ही प्रजा पर शासन करता है।दंड ही प्रजा का संरक्षण करता है।दंड ही धर्म है।जो बीर/बलवान होगा वही समाज के शत्रुओं को दंडित कर सकता है।
*पंचम गुण दीक्षा*
जब तक युवक दीक्षित नहीं होता तब तक शिक्षित होना कोई महत्व नहीं रखता।दीक्षा का मतलब है जिम्मेदारी लेना।निस्वार्थ भाव से *देश,देव व धर्म* के लिए प्राणों का उत्सर्जन करने वाले युवक ही दीक्षित कहलाते हैं।
*षष्ठम गुण तप*
तप का मतलब है हमने जो *देश,समाज,धर्म* रक्षा का व्रत लिया है उसके पालन में जो कष्ट,विध्न,वाधा आये सहते हुए प्रसन्नता पूर्वक च*सप्तम गुण ब्रह्म*लते रहना।

ब्रह्म का मतलब है युवकों को ईश्वर पर प्रगाढ़ श्रद्धा हो।युवक प्रतिदिन कम से कम एक घंटा समय निकाल कर *गायत्री वा ओ३म्* का अर्थ सहित जाप करें।ईश्वर के जाप से पाप से अरुचि होती है।आत्मबल,आत्मज्ञान,आत्मसंयम की प्राप्ति होती है।
*नवम गुण यज्ञ*
यज्ञ का अर्थ है युवक परिवाद,देश,समाज के साथ मिलकर काम करें। सकारात्म जीवन जियें नकारात्मक नहीं।श्रीराम व भरत में इतना अटूट संगठन था कि *भ्राता भरत ने अयोध्या का नेतृत्ध किया और श्री राम ने आतंकवादियों का सफाया कर भारत से लंका तक *चक्रवर्ती राज्य* की स्थापना की।
जिस राष्ट्र के युवकों में ये आठ गुण कूट-कूट कर भरे हों वो राष्ट्र कैंसा होता है?इसका उत्तर मंत्र के द्वितीय भाग में दिया है कि….
*सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्नी* उस देश के युवक राष्ट्र के भूत का गम मिटा देते है और राष्ट्र के भविष्य को सुरक्षित कर उसे विश्व विजेता बना सकते हैं।
इस वैदिक सेमिनार को आचार्य सत्यकाम व पंडिता रुक्मिणी शास्त्री ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन श्री रामेन्द्र देव जी ने किया।
आचार्य सुरेश
*प्रवासीय कार्यालय*
आर्य समाज मंदिर
इंदिरा नगर लखन ऊ